ग़ज़ल
ग़ज़ल
दुआएँ लिखती हूँ बिटिया मेरी तुम्हारे नाम,
तुम्हारी राह के,आँखों से चुनलूँ काँटे तमाम।
तुम्हारे हाथ में बूटे सुहाग के महकें,
ज़माने भर की मेंहदियाँ रचाना सुबहो-शाम ।
तुम्हारी यादों से महकी रहें मेरी धड़कन,
तुम्हारी यादों की खुशबू के ना लगें हैं दाम ।
हिज़्र के देखूँ मेरी चिड़िया, ये सुलगते दिन,
कभी तो आना अचानक तुम्हारे अंगना ओ बाम।
यह आँखें नहीं रहती है ख़ाली आंसुओं से अब,
सताए जख़्म ए जुदाई तुम्हारी सुबहो-शाम।
हमारे मुल्क़ में जाने क्यों बेटियाँ हों विदा?
पनाह मिलती है बिटियाओं को पिया के गाम,
सब्र की आजमाइशें ये बिटिया कैसी है ?
रूह बेचैन है, बाबुल का हुआ जीना हराम।
मेरे ख्वाबों में ख्यालों में, तुम ही तुम मेरी जान,
चला ही आता हरीक रोज़ तुम्हारे नाम क़लाम।
बिखर रहा है मेरा दिल मगर समेटूँ लफ़्ज़ों को,
बनी ग़ज़ल ये तुम्हारी ही ‘रूख़सती के नाम ।
शकुंतला सरूपरिया
गीत
बेटी होती क्यों पराई?
आज अंगना में उतरे कहार रे,
ले के तेरी डोली जाएँ उस पार रे,
सज-धज कर सोलह ऋंगार रे,
जाना लाड़ली तू पिया जी के द्वार रे।।
कैसे धीरज धरूँ? क्या उपाय करूँ?
अंसुअन से लाडो, मेरा दामन भरूँ।
तेरे बाबुल को लागे, हुई हार रे।
आज अंगना में उतरे कहार रे।। 2
इस जग में बना, तेरा मीत नया,
जीवन का हुआ, संगीत नया,
तुझे मिला लाडो नया परिवार रे।
आज अंगना में उतरे कहार रे।। 2
कैसी रीत है बनाई? बेटी होती क्यों पराई?
आँखे भर-भर आई, घड़ी शगुनों की आई।
विदा लेगी बेटी नहीं उपचार रे।
आज अंगना में उतरे कहार रे।। 2
तू दुआएँ लेती जाना, मुस्कानें लेती जाना,
सुख दःुख की सुनाना, जब मन आए आना
मेरे अंगना की सुरभि बहार रे,
तेरी मैया करे तेरा इंतज़ार रे
तेरी मैया करे तेरा इंतज़ार रे
शकुंतला सरूपरिया
2 गीत
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
मेरी सोन परी, नाज़ों की पली,
क्यों छोड़ रही बाबुल की गली?
दामन में माँ के आंसू भर,
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
धड़कन की इक झंकार है तू,
ख़ुशियों से भरा त्यौहार है तू,
तू बिछड़ रही तो जान जली,
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
तुझे प्रीत की छांव में पाला है,
सौंपा ममता का दुशाला है
परछाई तू मेरी मुझ में ढली,
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
पीहर का जो गाँव पराया हुआ,
हर पल तेरी यादों का साया हुआ,
यह कैसी उदासी की पवन चली
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
हर दिन दिवाली-होली हो,
हर इक की दुआ तेरी झोली हो,
रहे महकती मेरे दिल की कली,
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
मेरी सोन परी नाज़ों की पली,
क्यों छोड़ रही बाबुल की गली?
दामन में माँ के आंसू भर,
मेरी सोन चिरैया कहाँ चली?
शकुंतला सरूपरिया
Wow☺
ReplyDeleteVery good poems on daughter
ReplyDeleteSo impressive ,marmik
ReplyDeleteकविता बहुत सुन्दर है।फिर भी मेरी राय मे विता का सकारात्मक होना और तत्कालीन होना जरुरी है न ई पीढी के लिये।
ReplyDeleteव्यापक दृष्टिकोण लडकियों के मार्ग दर्शन के लिये जरुरी है।शादी ब्याह अब पीहर ससुराल और कहारों के नहीं रहे।लडकियां शादी से आगे की भी सोचती है।उस पर भी लिखें।
बहुत सुन्दर बधाई
ReplyDeleteVery nice mam 👍😊
ReplyDeleteMay God bless you always with everything in ur life 😇😇