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Showing posts from April, 2019

बेटी बिना अलोना घर है

बेटी बिना अलोना घर है बेटी जहाँ प्यार पाती हैए वह घर स्वर्ग समान है! बेटी बिना अलोना घर हैए या फीका पकवान है ! बेटी के हँसते ही खिलतेए जैसे चंदा तारे से किलकारी से झरते लगतेए फूलों के मह्कारे से अक्षतएचन्दन कुमकुमए बिंदिया बेटी की मुस्कान है! बेटी जहाँ प्यार पाती हैए वह घर स्वर्ग समान है! पौ फटते मीठे सपने सीए देहरी सजी रंगोली सी अन्नपूर्णा सी वरदानीए गाय गोमती भोली सी बजी शिवालय में ज्यों घंटीए मस्जीद उठी अजान हैं! बेटी जहाँ प्यार पाती हैए वह घर स्वर्ग समान है ! दुलराती निज शिशु भैया कोए अपने अकं समेटती राखी के कच्चे धागे मेंए पक्का नेह लपेटती घर के कोनों में तितली सीए भरती मुक्त उड़ान है! बेटी जहाँ प्यार पाती हैए वह घर स्वर्ग समान है! बेटी सीता बेटी गीता ए बेटी राधा रानी है बेटी सत की सावित्री हैए गंगाजी का पानी है महारास क्रीडा में बेटीए मुरली सी मृदु तान है! बेटी जहाँ प्यार पाती हैए वह घर स्वर्ग समान है! घर आँगन की सोनजुही हैए सौरभ भर महकाती है और पंख विकसित होते हीए चिड़िया सी उड़ जात...

मैं इसलिए जिंदा हूं कि मैं बोल रही हूं।

''मैं इसलिए ज़िंदा हूं कि मैं बोल रही हूं दुनिया किसी गूंगे की कहानी नहीं लिखती" वाक़ई अगर हम ज़िंदा हैं तो ज़िंदा नज़र आना भी ज़रूरी है । मगर देश और दुनिया के बदलते हालात में ज़िंदादिली से ज़िंदा रहना अब आसान नहीं है। इधर सियासत और हुूक़ूमत के बेढ़ंगे तेवर, उधर मीडिया की बेसिर पैर की 24 घंटे की बकबकाट और रोज़ाना की आम-आवाम की कुलबुलाहट, बढ़ती हुई  परेशानियों और तक़लीफ़ों को देखते हुए लग रहा है कि अब आने वाले दिन मुश्किलात भरे होंगे ।  जहां भी देखिए तो यह नज़र आता है कि "जो बे ज़मीर रहे बाज़मीर बन बैठे वो आज मालिके- तकदीर बन बैठे।  वह दूध बेच कर रहा साइकिल पर, शराब बेचने वाले अमीर बन बैठे।" अब इस सदी में दो काम आसानी से किए जा सकते हैं......या तो क़त्ल कर डालो इन सारे ज़िंदा ज़मीरों को,फिर तो आसान होगा लाशों पर हक़ूमत करना ।।   या फिर .... फनकार  हो तो हाथ में सूरज सजा के लाओ,बुझता हुआ दिया ना मुक़ाबिल हवा के लाओ।। असल में हो यह रहा है इस मुल्क में कि "हर तरफ माचिसों के बाज़ार है और हर आदमी जली हुई तीली लिए बैठा है।" कहां गया हमारा पंचशील का वह मंत्र,...

सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा।

 सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा हम बुलबुले हैं इसकी यह गुलसितां हमारा । *भारत जैसे इस सांस्कृतिक आ आर्यवर्त में इन दिनों मीडिया के फलक पर "मी टू "नाम के कृष्ण् का एक डिजिटल अवतार आया है जिसकी बांसुरी के मद्धम स्वरों से ही इस सभ्य समाज में ऐसा तूफान आया है ,जिसे कुछ लोग बासी कढ़ी ने उबाल का नाम दे रहे हैं। रामायण में सीता के हरण और महाभारत में द्रोपदी के चीर हरण की नाजायज़ घटनाएं सिद्ध करती है कि उस सतयुग  में भी  प्रतिष्ठित राज घराने की स्त्रियां भी  सुरक्षित नहीं थीं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम  की परछाई होने के और लक्ष्मण की लक्ष्मण रेखा खींच जाने के बावजूद  सीता का हरण हो चुका था और भरी सभा में पांच -पांच पांडव पतियों और सभी बड़े बुजुर्गों की मौजूदगी में दुर्योधन ने द्रौपदी का अपमान कर उसका चीर हरण किया। ख़ैर उस युग में तो भगवान राम और भगवान कृष्ण ने सीता और द्रौपदी को किसी तरह बचा ही लिया था । परंतु उस समय भी एक धोबी के कथन मात्र से बाद में भगवान श्री राम को गर्भवती माता सीता का त्याग करके अपने महल से वन जाने को कहना पड़ा था।  इस कलयुग ...