’हे कृष्ण ! बचा लो नन्ही-नन्ही बच्चियों को !!’
’हे कृष्ण ! बचा लो नन्ही-नन्ही बच्चियों को!!’ हे कृष्ण! आज गिनती कर रही हूँ इस बर्बर होते, क्रूर समाज में उन दुष्कर्मी पापियों के हाथों मसल दी गई, नन्हीं-नन्हीं बच्चियों की, जिनके दूध के दाँत तक नहीं गिरे हैं, अभी जिनकी आवाज़ की तुतलाहट बरक़रार है, जिनकी मासूम आँखों ने अभी तक अपने भविष्य के लिए एक भी सुंदर सपना तक नहीं देखा। जिनके नन्हें पाँवों ने अभी देहरी के बाहर आसपास के तमाम रास्तों को जाना और पहचाना तक नहीं है। मगर दुर्भाग्य से एक दिन के लिए ही सही,वो जो अखबारों की सुर्खियां बन चुकी हैं व जिन हतभागिनियों का ताज़ा नाम शामिल हो चुका है दुष्कर्म पीड़िताओं में। वह पीड़िता जिसने अभी सुख को जाना था, ना किसी दुःख को, यक़ायक़ लहूलुहान कर दी गई है तन -मन, आत्मा से घायल कर दी गई हैं और तभी तो सर पटक पटक के रो रही हैं ’’उनकी जन्म दायिनी माँ, भीतर ही भीतर मर चुके है,ं हताश-उदास बाबुल। स्तब्ध हैं परिजन आसपास के लोग रिश्तेदार। पूरे एक दिन चर्चा में रहती है वह अखबारी सुर्ख़ियों में आई एक ‘‘दुष्कर्म पीड़िता’’ के नाम से। याद है मुझे इंदौर की वह 4 माह की दूध पीती बच्ची ,...