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इन दुलारियों को भी बेटों का सा प्यार दो

सूरज अभी डूबा नहीं है आशा संजीवनी है समय आ गया है  जब इन दुलारियों को भी बेटों का सा प्यार दो अब बेटियों के जन्म पर भी थाली बजे  घर घर में, हर घर में  लड्डू बँंटें, खुशियाँ छा जाए।    वि दुषी अरुंधती, गार्गी लोपामुद्रा के इस देश की विडंबना है कि सरकार की लाखों कोशिशों और महिला संबंधी कानूनों के बावजूद, संकीर्ण मानसिकता, अंधविश्वास और हल्की सोच के कारण, लिंगानुपात गड़बड़ाया हुआ है और घरों में बेटे और बेटी में फर्क़ बरकरार है जिस कारण यहाँ महिलाएं दोयम दर्जे पर हैं और उनके प्रति अत्याचार के ख़तरे दिनों दिन बढ़ते ही चले जा रहे हैं। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार 2000 से 2500 कन्याएँ इस मुल्क में जनने से पहले ही मारी जा रही हैं बेटों को प्राथमिकता देने के कारण ग़ैरकानूनी तरीक़े से, छिपे तौर पर बेटियाँ माँ की कोख में कुछ ओेंस की बनते ही माँओं पर अनचाहा दबाव बनाकर निकाल दी जाती है और इसका दाग़ और आरोप भी उसी माँ पर लगाया जाता है कि वह माँ कोख में अपनी ही मूरत की रक्षा नहीं कर पाई। मिलेंगे। सदियों से औरत की, बेटी की अवहेलना, तिरस्कार, अपमान और अमानवीय व्यवह...