अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ !
जी नहीं सकते सिर्फ रोटी से कहा ईसा ने,
कुछ तो खुशबू सुख़न की गुलाबों में रहने दो!
इधर क्रांतिकारी कवि स्वर्गीय अदम गोंडवी ने कहा कि .............
अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ !
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद-तारों में!
इन दोनों ही कहन में सच्चाई की सुगंध है सही मायने में साहित्य या अदब हमारी जिंदगी की वह मशाल है जो हमें उजाला बख़्शती है। साहित्य की एक महत्वपूर्ण और सबसे ख़ूबसूरत विधा है कविता-शायरी। मगर आज की हिन्दी कविता कि इस विशाल दुनिया की हक़ीकत और हालात देख कर अब जाने क्यों महसूस होता है कि........
‘‘वक्त़ बेग़ैरत हुआ और हम तमाशा बन गए,
बस हमें हासिल यही है ज़ीस्त के एहसास में’’
कहा जाता है कि अहंकार से ओंकार तक की यात्रा का नाम है कविता, शब्द से निःशब्द, विभक्ति से भक्ति, विषाद से प्रसाद, ग्रंथ से निःर्ग्रंथ, व्यक्तित्व से अस्तित्व की ओर जाने का नाम है कविता। कविता भावों को टाँगने की एक कील है, यह अंतर में झांकने की एक खिड़की है। ताज़ी हवा आने का दरवाजा है और मन की देहरी पर जलता चिराग़ भी है कविता! इन दिनों ख़बरिया टीवी चैनलों पर दो कार्यक्रम कविताई के आए हैं। जिनमें गला फाड़ कर, बेहूदा अंदाज की कविताओं में सत्ता, सरकार, समाज को कोसते कवि-कवयित्री फूहड़ता की तमाम हदें पार कर तालियाँ पीटते नज़र आ रहे हैं। बदलते युग, बदलते मौसम, बदलते हालात में यह कविता जब भौं-भौ तक आई है तब लगता है कि यक़ीनन माँ वीणापाणि अपनी वीणा छोड़कर माता पकड़े बैठी होंगी। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि पत्रकारिता और साहित्य का चोली-दामन का साथ होने के बावजूद तथाकथित नामी चैनलों के ‘बड़े पत्रकारों’ की मौजूदगी में कार्यक्रम का टाई ‘‘भौं-भौं’’ एक कुत्ते की पीठ पर लिखा गया है। वाक़ई तरक़्क़ी तो हुई है हिन्दी कविता के मंचों की! सलोने गीतों, छन्दों, मुक्तकों से परे चुटकुले और फूहड़ता के साथ, वीर रस के नाम पर झूठे अंगारे बरसाते मंच पर चलायमान कवि व कवयित्रियों को धन और ऐश्वर्य ज़रूर दे रहे होंगे मगर उनकी हरकतों ने तुलसी कबीर, मीरां, जायसी, महादेवी, दिनकर प्रदीप की रूहों को ज़रूर छलनी किया होगा, यह बात यकीन से कही जा सकती है। हिंदी मंचों कि इस दुर्दशा पर कुछ कहना दुःखदायी भी है और शर्मनाक भी। जिसे कवि और इकलौती कवयित्रियों की अदाओं ने कव्वाली मंच का रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिन्दी मंच की खिड़की से अगर उर्दू शायरी और मुशायरों की तरफ़ नज़र डाले तो हालत दीगर ही नज़र आते हैं। वहाँ सच्चे सुख़नबरों का, सच्ची शायरी का ख़ूबसूरत नज़ारा आज भी क़ायम है। जहाँ चुटकुले और भौं-भौं की कोई गुंजाईश नहीं। आज भी अदब की तमीज़-तहज़ीब, सलीक़ा सब कुछ वहाँ मौजूद है। तो प्रश्न उठता है एक ग़लती कहाँ हुई कि हमारे हिंदी कविता के मंच फूहड़ता की भेंट चढ़ गए? आख़िर किसने मिलावट की है हिंदी मंचों की शुद्ध कविता में? दुर्भाग्य की बात है कि इस मिलावट के लिए कविगण जहाँ श्रोताओं पर आरोप मंढ़ते हैं वही श्रोता कवि समाज पर! आज इस आरोप-प्रत्यारोप को मीडिया के चैनल भौं-भौं व नेताजी लपेटे में कार्यक्रमों से और हवा देने में जुटे हैं। यानी करेला भी नीम चढ़ा! कैसा दौर है कि........
बेज़मीर के आगे बाज़मीर झुक जाते हैं,
एक माला के लिए पेड़ भी पौधे बन जाते हैं?
जो ताउम्र सलीके से खड़े नहीं हो पाये यहाँ,
उन के साए में आसमान टिक जाते हैं।
कोई जुल्फो में कोई आंसू में कोई मदहोशी में,
बांकपन देखकर हंसीं बाहों में रुक जाते हैं।
सूख जाती है जिनके दामन में नदियाँ,
वे हिमालय से तन के नज़र आते हैं।
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