गीत युग का हरकारा बोल गया। वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं, युग का हरकारा बोल गया। वह समय नहीं, वह लोग नहीं, मन का इकतारा बोल गया।। मिले पग पग पर दु:ख के छाले कुंठित क्यों मनुज का राग हुआ, हर सांस-सांस पीड़ा पाले, हर ओर वेदना का झाग हुआ। नहीं जीने योग्य यह काल रहा, विचलित जग सारा बोल गया। वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं युग का हरकारा बोल गया... हर आत्मा के तट पे बोझा है बोझे से जीवन बोझिल है, नश्वर जीवन के समदर में, मोहित तन- मन बड़ा चोटिल है। मरघट-सी है क्षण-क्षण लहरें, वह समदर ख़ारा बोल गया। वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं, युग का हरकारा बोल गया... हर ओर उदासी की रुत है, छिपी नैन अश्रु की नदियां, धरती हो गगन नित करें विलाप, रोएं दिन ओ शापित रतियां। इस लोक में राम तो बचा नहीं, सकता कोई राम का प्यारा बोल गया। वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं, युग का हरकारा बोल गया... विश्वास में स्वयं ही जोग लिया, सत्ता है झूठ की घर-घर में, पाताल में उतरा मनुज धर्म, नैतिकता भटके दर-दर में। वह राम ही जग में तारेगा, सच गुरु हमारा बोल गया।। वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं युग का हरकारा बोल गया... वह समय नहीं वह लोग नहीं मन क...
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मां की वदना शब्द सुर की थाली लेकर गाऊं मैया वंदना। रोशनी के दीप चरणों में बिछाऊं मां आंगना रूप और सिंगार संग तेरा, नव सजा दरबार मां, हस्त खप्पर और त्रिशूल हैं,सिंह पर असवार मां लाल चुनर सोहवे सिंदूर, बाजे खन खन कंगना तेरे चरणों में सुख की गंगा, ममता मां तू लुटाती है भक्तों की इक ही पुकार पर , मां तू दौड़ी आती है भाव अंतस लदा तेरी कृपा के झूले झुलूं, शरणों में रखना सदा मां जीवन की देहरी सूनी, सुख की बन्दनवारें टांगना। नौं नौं रूप दर्शाना मैया फिर से इस नवरात में, मंत्र उच्चारित करें, सब आरती करें साथ में, तेरे हाथों में दात्त्री लालिमा, वर मां भक्तों पे वारना
हिंदी है नाम इसका, भाषा यह हिंदुस्तानी है।’’
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हिंदी है नाम इसका, भाषा यह हिंदुस्तानी है।’’ विहरो बिहारी की विहार वाटिका में चाहे, सुर की कुटी में जा के आसन जमाईये। केशव के कुंज में किलोल-केलि कीजिए, तुलसी के मानस में डुबकी लगाइये। भिन्न भाषा भाषियों! मिलेगा मनमाना सुख, हिंदी के हिंडोले में जो कभी बैठ जाईये। कोई भी भाषा हो वह हमारी अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम हुआ करती है इस देश में वर्षों से 14 सितंबर को राज भाषा-यानी हमारी मातृ भाषा हिंदी दिवस के रूप में उत्सवपूर्ण तरीक़े से मनाया जाता है। यही वह दिन है जब हम हिंदी भाषा के महत्व उसकी गरिमा उसके वर्चस्व को स्वीकारते हुए संप्रेषण के इस सुंदर माध्यम की अखंड भारत में वंदना करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार इस बात को दोहराया जा रहा है कि हमारी मातृभाषा हिंदी का अस्तित्व दूसी कुछ भाषाओं के कारण ख़तरे में है यह भी बात मुख्य रूप से कही जा रही है इस देश में एक दिन हिंदी के नाम पर एवं शेष दिवस सब हिंदी की अवहेलना में लगे रहते हैं। जबकि सच्चाई यह नहीं है भारत को एक सूत्र में पिरोये रखने में 17 उपभाषाओं को मिला कर बनी हिंदी भाषा की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। ‘‘हिंदी है नाम इ...
इन दुलारियों को भी बेटों का सा प्यार दो
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सूरज अभी डूबा नहीं है आशा संजीवनी है समय आ गया है जब इन दुलारियों को भी बेटों का सा प्यार दो अब बेटियों के जन्म पर भी थाली बजे घर घर में, हर घर में लड्डू बँंटें, खुशियाँ छा जाए। वि दुषी अरुंधती, गार्गी लोपामुद्रा के इस देश की विडंबना है कि सरकार की लाखों कोशिशों और महिला संबंधी कानूनों के बावजूद, संकीर्ण मानसिकता, अंधविश्वास और हल्की सोच के कारण, लिंगानुपात गड़बड़ाया हुआ है और घरों में बेटे और बेटी में फर्क़ बरकरार है जिस कारण यहाँ महिलाएं दोयम दर्जे पर हैं और उनके प्रति अत्याचार के ख़तरे दिनों दिन बढ़ते ही चले जा रहे हैं। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार 2000 से 2500 कन्याएँ इस मुल्क में जनने से पहले ही मारी जा रही हैं बेटों को प्राथमिकता देने के कारण ग़ैरकानूनी तरीक़े से, छिपे तौर पर बेटियाँ माँ की कोख में कुछ ओेंस की बनते ही माँओं पर अनचाहा दबाव बनाकर निकाल दी जाती है और इसका दाग़ और आरोप भी उसी माँ पर लगाया जाता है कि वह माँ कोख में अपनी ही मूरत की रक्षा नहीं कर पाई। मिलेंगे। सदियों से औरत की, बेटी की अवहेलना, तिरस्कार, अपमान और अमानवीय व्यवह...
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सरस्वती वंदना रोशनी के गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ,रागिनी के गाँव में।। भावना को मांज दे तू, साधना को साध दे तू, दिव्य लक्ष्यों की सवारी, शीश पे माँ हाथ दे तू। आशीषों से मैं नहा गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। मन को चन्दन की महक दे, भीगी भीगी नम पलक दे, कंठ में भर माँ सरसता, होंठों कोयल सी कुहुक दे। हर ऋतु के गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। गीतों का मधुमास माँगू, रागों का आवास माँगू, जागरण स्वर की वो लहरी, माँ तेरा विश्वास माँगू, तू लिखा वो गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। वेदनाएँ जग की हर लूँ, सब के अश्रु नैन भर लूँ, विमल दृष्टि,नवल पथ दे, तेरे चरण मे शीश धर लूँ, इतना बस वरदान पाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। बहाने थे बहाने ही रहे ग़ज़ल धड़कनों के हम बहाने थे बहाने ही रहे, ग़म हमारे यूँ दिवाने थे दिवाने ही रहे। चेहरे पर चेहरा सजाये थक चुके हैं अब तो हम, ख़्वाब...
अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
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अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ! जी नहीं सकते सिर्फ रोटी से कहा ईसा ने, कुछ तो खुशबू सुख़न की गुलाबों में रहने दो! इधर क्रांतिकारी कवि स्वर्गीय अदम गोंडवी ने कहा कि ............. अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ! मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद-तारों में! इन दोनों ही कहन में सच्चाई की सुगंध है सही मायने में साहित्य या अदब हमारी जिंदगी की वह मशाल है जो हमें उजाला बख़्शती है। साहित्य की एक महत्वपूर्ण और सबसे ख़ूबसूरत विधा है कविता-शायरी। मगर आज की हिन्दी कविता कि इस विशाल दुनिया की हक़ीकत और हालात देख कर अब जाने क्यों महसूस होता है कि........ ‘‘वक्त़ बेग़ैरत हुआ और हम तमाशा बन गए, बस हमें हासिल यही है ज़ीस्त के एहसास में’’ कहा जाता है कि अहंकार से ओंकार तक की यात्रा का नाम है कविता, शब्द से निःशब्द, विभक्ति से भक्ति, विषाद से प्रसाद, ग्रंथ से निःर्ग्रंथ, व्यक्तित्व स...
अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे?
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अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे? तेज धूप की तपिश में कैसी मधुमासों की बातें? किसको भली लगेंगी मिथ्या विश्वासों की बातें? हमको कथा सुनाके सीता और झांसी रानी की, संत सरीख़े लोग करें अब हमसे झांसो की बातें! अभी-अभी दशहरा बीता, हर साल की तरह ही पूरे देश के कोने-कोने में रावण के पुतले जलाने का जश्न यूं मनाया गया जैसे कि रावण तो सदियां पूर्व ही ख़तम हो गया। मगर यह क़तई सच नहीं है। आज जब दिन रात मीडिया के ज़रिये सालों से पूजित धर्मगुरु आसाराम और उनके पुत्र नारायण प्रेम सांई के कृत्यों का जिस तरह का नित नया खु़लासा देखने को मिल रहा है उससे सबके सब भयभीत और चकित हैं कि रावण के अंश अभी भी मौजूद हैं। यानि सीताओं का हरण करने वाला रावण अभी मरा नहीं है। वहीं आज भी द्रोपदी का सरेआम चीर हरण करने वाले दुर्योधन भी इस देश की अनेक शरीफ़ बस्तियों में छिपे हुए हैं और रात के उजाले को दिन में, दिन के उजाले को रात में बदलने में माहिर वे शातिर दुर्जन दुर्योधन कहीं नन्हीं बच्चियों को, कहीं किशोरी और युवतियों को,और कहीं कमज़ोर तन्हा औरतों का चीरहरण कर रहें हैं जिसकी ख़बरें पढ़ सुन कर दिल छटपटाता है, ...