उजाले क़ैद हैं उस रोशनी के शहर में,
उजाले क़ैद हैं उस रोशनी के शहर में,
क़ैद हों जैसे चांद सूरज रोशनी के शहर में।
ख़ुशी के मुखौटों में ज़िंदगी जलती है,
इंसान क़ैद हों जैसे रोशनी के शहर में।
हाल ही में ज़िंदगी की पहली विदेश यात्रा दुबई की हुई। क्या रोशनी, क्या रोनैक़ क्या जलवे, क्या ख़ूबसूरती, कितने खूबसूरत नज़ारे थे? और उन नौं दिनों में मानों एक ख़ूबसूरत मख़मली माहौल में ज़िंदगी के सबसे बेशकीमती पल हमने जी लिय। मगर दुबई की यही सच्ची की तस्वीर नहीं है सच्चाई कुछ और भी है। दुबई एक ऐसा देश है जो ‘‘संयुक्त अरब अमीरात’’ का हिस्सा है, जिसकी जनसंख्या हमारी राजधानी दिल्ली से भी कम है। वहाँ पर पीढ़ी दर पीढ़ी शेख़ का राज चलता है। वर्तमान शेख़ की दिली तमन्ना है कि सन 2020 तक दुबई दुनिया का पहला आकर्षक पर्यटन स्थल बन जाए, जहाँ सर्वाधिक सैलानी आएँ। इसके लिए वह वहाँ असंख्य उच्चस्तरीय होटल बनवा कर और उच्च तकनीकी के साज़ो सामान ला कर विशेष निर्माण करवा रहे हैं। वहाँ भ्रमण के दौरान टैक्सी चालकों से बातचीत में पता चला कि दुबई में 35 फीसदी भारतीय, 35 फीसदी पाकिस्तान, बांग्लादेशी कुछ अन्य देशों के बाशिंदे रोज़गार की तलाश में पहुँचे हैं लेकिन उनके अपने अरेबियन 22 फीसदी हैं। अपने अरेबियन नागरिकों को निःशुल्क सुविधाएँ दी हैं उनके आवास निवास रोज़गार सबकी चिंता भी शेख़ करते हैं । वहीं हम ने जगह-जगह देखा की दुबई में बुर्केदार मुस्लिम युवा विवाहिताएँ जिनकी बुर्के से केवल दो आँखें दिखाई देती थीं, उनके साथ दो तीन बच्चे लगभग हमउम्र के होते थे और हाथ गाड़ी में एक शिशु भी होता था। इस से अंदाजा लगा कि शायद अरबी जनसंख्यरत्रा बढ़ाने की मंशा से यहाँ अरेबियन परिवारों को राजसत्ता वहां जन संख्या बढ़ाने पर की ओर से ज़रूर दिरम ( दुबई की मुद्रा ) देने का प्रावधान होगा और बातचीत में यह बात बिल्कुल सच निकली। दुबई में उच्च पदों पर केवल और केवल स्थायी अरेबियन लोगों को ही नियुक्तियाँ मिलती है व वहाँ भारतीय व अन्य देशों के निवासियों को अधीनस्थ पदों पर ही लगाते हैं। इसके अलावा वहाँ क़ानूनन कोई भी विदेशी व्यापार करना चाहे तो उसमें वहीं के किसी स्थाई निवासी की 45 प्रतिशत भागीदारी आवश्यक है। क़ानूनन वहां का स्थाई निवासी दो या तीन से अधिक व्यापार में भी भागीदार बन सकता है । पर एक ख़ास बात यह है कि वहाँ बरसों बसे रहने के बाद भी किसी को नागरिकता मिलना आसान काम नहीं है। वहाँ के नियमानुसार कोई भी विदेशी वहाँ के स्थायी लड़के या लड़की से विवाह करे और उनकी जो संतान हो उसे वहां की नागरिकता की स्वीकृति मिलेगी। है ना अजीब बात! धन्य है हमारा देश भारत कि... जो भी आए ‘‘पधारो म्हारे देश’’ यानी ‘‘स्वैग से करेंगे सबका स्वागत’’!! व्यवस्थित और सजा संवरा दुबई शहर, जहाँ किसी अरबी व्यक्ति के चेहरे पर वह मासूमियत,मुस्कान व खिलखिलाहट गायब थी, एक अलग तरह के रौब और गुरुर में तने तने से अरबी व्यक्ति से एक अज़ीब सा ख़ौफ़ भी महसूस होता था। सबसे विचित्र तो हमें यह लगा कि वहाँ पर किसी विदेशी व्यक्ति को गाड़ी चलाने का लाइसेंस मिल जाना किसी जंग को जीत लेने से कम नहीं है। 6-7 माह की लंबी प्रक्रिया के बाद लगभग दो लाख (भारतीय रुपए) में वहाँ लाइसेंस मिलता है। वहाँ चालक रहित मैट्रो व सिटी बसें चलतें हैं। वहाँ की सड़क पर न स्कूटर चलते हैं ना मोटरसाइकिल न ऑटो। कुछ एक दोपहिया वाहन वहा की स्थाई दुकानों पर दूध बेकरी के बिस्किट, ब्रेड, भोजन और अन्य खाद्य सामान आदि इधर-उधर पहुँचाने के लिए रखने की इजाज़त है। आश्चर्य है कि अगर आपकी गाड़ी गंदी है तो आप उसे बग़ैर साफ़ किए सड़क पर ला नहीं सकते वरना कई दिरम का ज़ुर्माना लगेगा राडार की क्रूर निगाहों में जीता यह देश हर पल जुर्माने के खतरे को महसूस करता है। हांलाकि लोग ज़ाबां से तो कहते हैं कि ऐसी सख़्ती अपने देश में भी होनी चाहिये तो सब दुष्कर्मों, भ्रष्टाचार, और बेईमानियों पर रोक लग जायेगी, मगर इसकी कल्पना भी ख़तरनाक महसूस होती । सड़क पर पैदल चलते हमें भी डर लगता रहा, क्योंकि वहाँ नियम-क़ानून इतने तगड़े हैं कि पैदल व्यक्ति भी अगर नियमानुसार नहीं चल रहा है तो तुरंत उस पर ज़ुर्माना लग जाता है। वहीं गाड़ी धारक से तीन से अधिक बार नियमाल्लुंघन होते ही उसका लाइसेंस रद्द किया जाता है। वहाँ ले-दे के कुछ नहीं सकता! आप वहाँ 80 से 120 की रफ़्तार से गाड़ी चलाने को पाबंद है। वहाँ पर पता चला कि कुछ इलाक़ों में व राजमार्गों में सड़क पर आपको पैदल चलने तक की स्वीकृति नहीं है। मेट्रो में, सड़क पर कारों में कभी भी खाने और पीने की इजाज़त नहीं है। वहाँ पानी व पेट्रोल दोनों की क़ीमते बराबर है। जितना वहाँ पानी कम मिलता हमें उतनी ज़्यादा प्यास लगती थी। स्वर्ण आभूषणों से भरे पूरे बाजारों, के अलावा चीन और भारतीय वस्तुओं से वहां भरी-पूरी दुकानें हैं। वही ग्लोबल विलेज, मिरेकल गार्डन, बुर्ज खलीफ़ा, दुबई मॉल,अमीरात मॉल, डेजर्ट सफारी, क्ऱूस, अंडर वाटर पार्क, फिश एक्वेरियम, ममज़ार पार्क व बीच और मरीना, ज़ुमेरा बीच, जुमेरा होटल कितना अद्भुत था सब देखना। सब कुछ एक से बढ़कर एक हर दिन बेहद खूबसूरत रहा मगर सच है कि वहां की फिजा में एक काली घुटन है सचमुच आजादी और ज़िंदगी के असली मज़े तो हमारे इस अपने वतन में हैं जहाँ की आज़ादी का मीठा अद्भुत स्वाद किसी दूसरे के स्वाद से कतई नहीं मिलता। तभी तो उस सपनीले रोशनी भरे शहर के नाम दिल से आवाज़ निकली कि
मोम का जिस्म लिए कैसे आऊँ अमीरे-शहर में,
आग में सपने सुलगते हैं आज़ादी के मेरे। (आगे फिर कभी)
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