Posts

Showing posts from May, 2019

ग़ज़ल- नज़्म

ए हिन्दुस्तान के लोगों सुनो,बेटी को पराई मत कहना यूँ दूर बड़ी परदेस में माँ, पलकों पे बैठी रहती है अब एक अकेली तन्हा वो, वीराने सहरा में रहती है जब त्यौहारों के दिन आएँ, ख़ामोश वो चुप-चुप रहती है घर-घर में जब ख़ुशियाँ हँसती तब, मेरी माँ की आँखे झरती हैं। जब बाबुल थे धड़कन-धड़कन तब माँ त्यौहार सी लगती थी श्रृंगार था उसका इक बिन्दिया चूड़ी-पाजेब में सुर भरती थी हाथों में मेंहदी के बूटे गोटे की साड़ी जँचती थी मंतर घर की ख़ुशहाली के माँ लम्हा-लम्हा जपती थी। माँ बिना तेल की बाती सी धू-धू करती अब जलती है, जैसे ख़ुशबू के बिन कोई फुलवारी ज़िन्दा रहती है। करुणा, ममता से रिश्तों की हर बन्दनवार सजाती माँ देखा, पी कर सब रंजो-ग़म पुरखों की रीत, निभाती माँ आँखों-आँखो में पलते हम बुरी नज़रों से भी बचाती माँं  नींदों मेंख़्वाब में डरें ना हम सिरहाने चाकू छिपाती माँ बदरी बन के यूँ दुआओं की हर मुश्किल से लड़ जाती माँ अब मैं हूँ यहाँ और माँ है वहाँ यादों से धड़कन जलती है रहती हूँ अपने पी के घर पीहर में आँखे रहती हैं। माँ जैसी जहाँ म...

कैसे कहें कथाएँ,तन की, मन की, जीवन की?

कैसे कहें कथाएँ,तन की, मन की, जीवन की?  सच कोई सुनने को कोई तैयार नहीं।  जिधर स्वार्थ हो, झुके उधर ही सुई मान्यता की, यहाँ असलियत का कोई आधार नहीं।  झेल सके नंगे सत्य के संदर्भों को जो,  इस शताब्दी में ऐसा कोई परिवार नहीं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की दहलीज़ पर कुछ दिनों पहले ही दिल्ली के प्रतिष्ठित महाविद्यालय में 20 वर्षीया पंजाबी लड़की गुल मेहर का जंग का रास्ता छोड़ कर शांति और वार्ता की राह अपनाने की गुहार लगाना जहाँ उस पर उल्टा पड़ गया, उसी के साथ यह एहसास हुआ कि इस मुल्क़ में अब के फागुन का मौसम अशिष्ट हो चला है। हर तरफ़ फ़िज़ूल के जुमले, नारे, बयानों की जुगाली और बहस के साथ ही ‘‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’’ के नारे के बीच उस शहीद की बेटी को दुष्कर्म की धमकियाँ मिलने का सिलसिला इस फ़िक्ऱ को बढ़ा गया कि बेटियाँ कैसे बचेंगी यहाँ? बताइए क्या हो रहा है इस देश में भला? शिक्षा के मंदिरों में कैसा वातावरण बन जाता है कुछ नादानों के कारण। पिछले दिनों गुलमेहर इस बात को ट्विटर पर कहने पर ‘‘कि मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा है’’ बड़ा ही गंभीर  मानते हुए चंद...

सर्द सुबह की धूप शकुंतला-(कविता)

यह कविता मेरीअग्रजा जोधपुर में रहने वालीं ख्यातनाम साहित्यकार डॉ.पदमजा शर्मा ने मेरे नाम लिखी। न जाने कब उन्होंने अपनी आँखों  और दिल के एक्सरे से मेरे भीतर झाँंक लिया! शुक्रिया दीदी ! ढेर सारा प्यार।                                   सर्द सुबह की धूप शकुंतला      बहुत अच्छा लगा जयपुर में       थोड़े से वक़्त में  बहुत सारा समय आपके साथ बिताना  देर रात तक कविताएँ सुनना-सुनाना आपका मेरे लिए               कविताओं का चयन करना                         उन्हें क्रम से लगवाना                                                                   इधर उधर की बा...

ग़ज़ले, नज़्म

ग़ज़लें, नज़्म ग़ज़ल जवां नैनों को ख़्वाबों की ये फसलें कौन देता है? लबों को गुनगुनाहट उनको ग़ज़लें कौन देता है? यहाँ हों नफ़रतें सरेआम मोहब्बत चुपके-चुपके से, मोहब्बत को नफ़रतों के बदले कौन देता है? तुझे मिल जाएगा सब कुछ अमीरी में ज़माने से, मुफ़लिसी में चवन्नी तुझको पगले कौन देता है? क़त्ल करे भाई-भाई का ज़मी के टुकड़े के ख़ातिर, सगे माँ-बाप को भी अपने बंगले कौन देता है? मुल्क़ के बुनियादी मुद्धे तो हैं ग़ायब सनसनी में यूँ, ख़बर वालों को ऐसे-वैसे मसले कौन देता है? कोख में भी नहीं महफ़ूज़ हिफ़ाज़त से कहाँ बेटी,  लड़कियों को ये कोठे और चकले कौन देता है? यूँ कुर्सी हाथों से देके क्यूँ फिर सरकार को कोसें, क़ीमती वोट अपना, उनको पहले कौन देता है? आज इन्सानियत गुम है उजाड़ा सबने क़ुदरत को, परिन्दों के घौंसलों को भी जंगले कौन देता है? क़िताबों में हों या महफ़िल में हक़ीक़त जानें हैं उस्ताद, कि ग़ज़लें कौन देता है,और हज़लें कौन देता है? ग़ज़ल प्रीत की आग में दिल हवन हो गया, याद की राग में मन मगन हो गया। जब किसी से लगन की ये लौ है लगी, धड़कनों-धड़कनों मे...

उजाले क़ैद हैं उस रोशनी के शहर में,

उजाले क़ैद हैं उस रोशनी के शहर में,  क़ैद हों जैसे चांद सूरज रोशनी के शहर में। ख़ुशी के मुखौटों में  ज़िंदगी  जलती है,  इंसान क़ैद हों जैसे रोशनी के शहर में। हाल ही में ज़िंदगी की पहली विदेश यात्रा दुबई की हुई। क्या रोशनी, क्या रोनैक़ क्या जलवे, क्या ख़ूबसूरती, कितने खूबसूरत नज़ारे थे? और उन नौं दिनों में मानों एक ख़ूबसूरत मख़मली माहौल में ज़िंदगी के सबसे बेशकीमती पल हमने जी लिय। मगर दुबई की यही सच्ची की तस्वीर नहीं है सच्चाई कुछ और भी है। दुबई एक ऐसा देश है जो ‘‘संयुक्त अरब अमीरात’’ का हिस्सा है, जिसकी जनसंख्या हमारी राजधानी दिल्ली से भी कम है। वहाँ पर पीढ़ी दर पीढ़ी शेख़ का राज चलता है। वर्तमान शेख़ की दिली तमन्ना है कि सन 2020 तक दुबई दुनिया का पहला आकर्षक पर्यटन स्थल बन जाए, जहाँ सर्वाधिक सैलानी आएँ। इसके लिए वह वहाँ असंख्य उच्चस्तरीय होटल बनवा कर और उच्च तकनीकी के साज़ो सामान ला कर विशेष निर्माण करवा रहे हैं। वहाँ भ्रमण के दौरान टैक्सी चालकों से बातचीत में पता चला कि दुबई में 35 फीसदी भारतीय, 35 फीसदी पाकिस्तान, बांग्लादेशी कुछ अन्य देशों के बाशिंदे रोज़गार की...

ग़ज़ल

 ग़ज़ल दुआएँ लिखती हूँ बिटिया मेरी तुम्हारे नाम,  तुम्हारी राह के,आँखों से चुनलूँ काँटे तमाम।   तुम्हारे हाथ में बूटे सुहाग के महकें,  ज़माने भर की मेंहदियाँ रचाना सुबहो-शाम ।  तुम्हारी यादों से महकी रहें मेरी धड़कन,  तुम्हारी यादों की खुशबू के ना लगें  हैं दाम ।  हिज़्र के देखूँ मेरी चिड़िया, ये सुलगते दिन,  कभी तो आना अचानक तुम्हारे अंगना ओ बाम।  यह आँखें नहीं रहती है ख़ाली आंसुओं से अब, सताए जख़्म ए जुदाई तुम्हारी सुबहो-शाम।  हमारे मुल्क़ में जाने क्यों बेटियाँ हों विदा?  पनाह मिलती है बिटियाओं को पिया के गाम,  सब्र की आजमाइशें ये बिटिया कैसी है ?  रूह बेचैन है, बाबुल का हुआ जीना हराम।  मेरे ख्वाबों में ख्यालों में, तुम ही तुम मेरी जान,  चला ही आता हरीक रोज़ तुम्हारे  नाम क़लाम।  बिखर रहा है मेरा दिल मगर समेटूँ लफ़्ज़ों को, बनी ग़ज़ल ये तुम्हारी ही ‘रूख़सती के नाम ।  शकुंतला सरूपरिया  गीत  बेटी होती क्यों पराई?  आज अंगना में उतरे कहार रे,...