सरस्वती वंदना रोशनी के गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ,रागिनी के गाँव में।। भावना को मांज दे तू, साधना को साध दे तू, दिव्य लक्ष्यों की सवारी, शीश पे माँ हाथ दे तू। आशीषों से मैं नहा गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। मन को चन्दन की महक दे, भीगी भीगी नम पलक दे, कंठ में भर माँ सरसता, होंठों कोयल सी कुहुक दे। हर ऋतु के गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। गीतों का मधुमास माँगू, रागों का आवास माँगू, जागरण स्वर की वो लहरी, माँ तेरा विश्वास माँगू, तू लिखा वो गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। वेदनाएँ जग की हर लूँ, सब के अश्रु नैन भर लूँ, विमल दृष्टि,नवल पथ दे, तेरे चरण मे शीश धर लूँ, इतना बस वरदान पाऊँ, चाँदनी के गाँव में। शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।। बहाने थे बहाने ही रहे ग़ज़ल धड़कनों के हम बहाने थे बहाने ही रहे, ग़म हमारे यूँ दिवाने थे दिवाने ही रहे। चेहरे पर चेहरा सजाये थक चुके हैं अब तो हम, ख़्वाब...
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Showing posts from July, 2019
अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
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अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ! जी नहीं सकते सिर्फ रोटी से कहा ईसा ने, कुछ तो खुशबू सुख़न की गुलाबों में रहने दो! इधर क्रांतिकारी कवि स्वर्गीय अदम गोंडवी ने कहा कि ............. अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ! मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद-तारों में! इन दोनों ही कहन में सच्चाई की सुगंध है सही मायने में साहित्य या अदब हमारी जिंदगी की वह मशाल है जो हमें उजाला बख़्शती है। साहित्य की एक महत्वपूर्ण और सबसे ख़ूबसूरत विधा है कविता-शायरी। मगर आज की हिन्दी कविता कि इस विशाल दुनिया की हक़ीकत और हालात देख कर अब जाने क्यों महसूस होता है कि........ ‘‘वक्त़ बेग़ैरत हुआ और हम तमाशा बन गए, बस हमें हासिल यही है ज़ीस्त के एहसास में’’ कहा जाता है कि अहंकार से ओंकार तक की यात्रा का नाम है कविता, शब्द से निःशब्द, विभक्ति से भक्ति, विषाद से प्रसाद, ग्रंथ से निःर्ग्रंथ, व्यक्तित्व स...
अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे?
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अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे? तेज धूप की तपिश में कैसी मधुमासों की बातें? किसको भली लगेंगी मिथ्या विश्वासों की बातें? हमको कथा सुनाके सीता और झांसी रानी की, संत सरीख़े लोग करें अब हमसे झांसो की बातें! अभी-अभी दशहरा बीता, हर साल की तरह ही पूरे देश के कोने-कोने में रावण के पुतले जलाने का जश्न यूं मनाया गया जैसे कि रावण तो सदियां पूर्व ही ख़तम हो गया। मगर यह क़तई सच नहीं है। आज जब दिन रात मीडिया के ज़रिये सालों से पूजित धर्मगुरु आसाराम और उनके पुत्र नारायण प्रेम सांई के कृत्यों का जिस तरह का नित नया खु़लासा देखने को मिल रहा है उससे सबके सब भयभीत और चकित हैं कि रावण के अंश अभी भी मौजूद हैं। यानि सीताओं का हरण करने वाला रावण अभी मरा नहीं है। वहीं आज भी द्रोपदी का सरेआम चीर हरण करने वाले दुर्योधन भी इस देश की अनेक शरीफ़ बस्तियों में छिपे हुए हैं और रात के उजाले को दिन में, दिन के उजाले को रात में बदलने में माहिर वे शातिर दुर्जन दुर्योधन कहीं नन्हीं बच्चियों को, कहीं किशोरी और युवतियों को,और कहीं कमज़ोर तन्हा औरतों का चीरहरण कर रहें हैं जिसकी ख़बरें पढ़ सुन कर दिल छटपटाता है, ...