ग़ज़ले, नज़्म
ग़ज़लें, नज़्म
ग़ज़ल
जवां नैनों को ख़्वाबों की ये फसलें कौन देता है?
लबों को गुनगुनाहट उनको ग़ज़लें कौन देता है?
यहाँ हों नफ़रतें सरेआम मोहब्बत चुपके-चुपके से,
मोहब्बत को नफ़रतों के बदले कौन देता है?
तुझे मिल जाएगा सब कुछ अमीरी में ज़माने से,
मुफ़लिसी में चवन्नी तुझको पगले कौन देता है?
क़त्ल करे भाई-भाई का ज़मी के टुकड़े के ख़ातिर,
सगे माँ-बाप को भी अपने बंगले कौन देता है?
मुल्क़ के बुनियादी मुद्धे तो हैं ग़ायब सनसनी में यूँ,
ख़बर वालों को ऐसे-वैसे मसले कौन देता है?
कोख में भी नहीं महफ़ूज़ हिफ़ाज़त से कहाँ बेटी,
लड़कियों को ये कोठे और चकले कौन देता है?
यूँ कुर्सी हाथों से देके क्यूँ फिर सरकार को कोसें,
क़ीमती वोट अपना, उनको पहले कौन देता है?
आज इन्सानियत गुम है उजाड़ा सबने क़ुदरत को,
परिन्दों के घौंसलों को भी जंगले कौन देता है?
क़िताबों में हों या महफ़िल में हक़ीक़त जानें हैं उस्ताद,
कि ग़ज़लें कौन देता है,और हज़लें कौन देता है?
ग़ज़ल
प्रीत की आग में दिल हवन हो गया,
याद की राग में मन मगन हो गया।
जब किसी से लगन की ये लौ है लगी,
धड़कनों-धड़कनों में भजन हो गया।
धूल से बीज मिल के खिलें फूल सब,
फूलों ही फूलों से मिल चमन हो गया।
धीरे-धीरे चला वो क़ामयाबी के साथ,
देखते-देखते वो गगन हो गया।
अपनों से ज़ख़्म खा कर सुलगते रहे,
गै़रों से मिला ज़ख़्म तो सहन हो गया।
हर तरफ़ हादसों की ही लपटें उठें,
जीना तो ऐसे में इक सपन हो गया।
मिट गई सब नेकियाँ तूफ़ान में,
आदमी था बदी में दफ़न हो गया।
इस क़दर हावी है ज़िन्दगानी में वो,
मेरी ग़ज़लों में वो इक कहन हो गया।
अब न होता असर आदमी पर कोई,
मोटी खालों का उसका बदन हो गया।
ग़ज़ल
मन के आंगन दुःख का डेरा,
कब आयेगा सुखद सवेरा।
आस थकी है निराशा जागी,
अविश्वासों का है बड़ा घेरा।
ये जग तो ऊपर वाले का,
न कुछ तेरा ना कुछ मेरा।
एक अकेला सूरज चमके,
चारों तरफ़ क्यों धुंध अंधेरा।
जीवन रथ को लेकर जग में,
आईं लगाने धड़कनें फेरा।
अमर न कोई सबने जाना,
चार दिनों का सब का बसेरा।।
ग़ज़ल
पराया धन क्यूं कहते हो तुम्हारा ही खजाना हूं
न मारो कोख में मुझको, मैं जीने का बहाना हूं़ ।
दरो-दिवार दरवाजे़, हर आंँगन की ज़रुरत हूंँ,
मोहब्बत की हूंँ मैं देहरी ,मैं ख़ुशियों फसाना हूंँ।
कहीं बेटी, कहीं बहना, कहीं बीवी,कहीं हूंँ माँ,
मैं रिश्तों का वो सन्दल हूंँ ,मैं ख़ुशबू का घराना हूंँ।
मैं मेहमाँ, हूंँ, परिन्दा हूंँ, पड़ौसी का वो पौधा भी,
क्यूँ माना मुझको बर्बादी,ग़मों का क्यूँ तराना हूंँ।
सुबह हूंँ,रात हूंँ, गुल हूंँ, ज़मीं मैं, आसमाँ भी मैं,
मैं सूरज-चाँद-तारा हूंँ, मैं दुनिया, मैं ज़माना हूंँ।
दुआ हूंँ मैं ही तो, रब की, मैं शोला हूंँ, मैं ही शबनम,
लहर हूंँ, मैं समन्दर हूंँ, मैं गुलशन, मैं वीराना हूंँ।
हज़ारों साल-ओ-सदियाँ, मेरी बेनूरी को रोए
दीदावर कोई तो कहते मैं तो बेटी का दीवाना हूंँ।
ग़ज़ल
माँ मेरे क़त्ल की, तू हाँ क्यूँ भरे?
खिलने से पहले, इक कली क्यूँ झरे?
मेरे बाबुल बता, मेरी क्या ख़ता?
मेरे मरने की बददुआ, क्यूँ करे?
कौन कहता है, रब की सूरत तू ?
कोई रब यूँ किसी, का ख़ूँ क्यूँ करे?
तेरे क़दमों में, माँ जो जन्नत है,
उसे शम्शान-क़त्लगाह क्यूँ करे?
झाँक के कोख में मशीनों से,
मुझे साज़िश से परे क्यूँ करे?
कोख का तू किराया लेना वसूल
क़त्ल का पाप तेरे सर क्यूँ धरे
मुझसे क्या ख़तरा, ख़ौफ़ तू बता?
तेरी मूरत हूंँ, मुझसे तू क्यूँ डरे?
ये तो सच है कि, माँ तू पत्थर है,
मुझपे पत्थर कोई, रहम क्यूँ करे??
ग़ज़ल
ना जाने क्यूँ लड़कियों के, अपने घर नहीं होते?
जो उड़ना चाहें अंबर पे तो, अपने पर नहीं होते।
आंसू दौलत, डाक बैरंग, बंजारन सी ज़िंदगानी,
सिवा ग़म के, लड़कियों के ज़मीनो-ज़र नहीं होते।
ख़्वाब देखे कोई वो, उनपे रस्मों के लाख पहरे
लड़कियों के ख़्वाब सच पूरे, उम्र भर नहीं होते
हौसलों के ना जे़वर हैं हिफ़ाज़त के नहीं रिश्ते,
शानो-शौक़त होती, अपनी झुके से सर नहीं होते।।
बड़ी नाज़ुक मिजाज़ी है बड़ा मासूम दिल इनका,
जो थोड़ी ख़ुदग़रज होतीं, किसी के डर नहीं होते।
कभी का मिलता हक़ इनको, सियासत के चमन में भी,
सियासत की तिज़ारत के, जो लीडर सर नहीं होते।
लड़कियों की धड़कनों पे, निगाहें माँ की भी क़ातिल,
कोख में मारी ना जातीं, जो माँ के चश्मेतर होते।।
7
बिटिया (नज़्म)
कोख में कोई कली खिलती है बिटिया बनके,
माँ की ख़ुशियों का हरेक रंग क्यूँ उड़ जाता है?
एक अहसास क्यूँ शर्मिन्दा बनाए माँ को?
ग़्ौरों अपनों का यूँ चेहरा क्यूँ उतर जाता है??
सारी दुनिया में परिन्दों का भी घर होता है,
बेटियों का ना कोई घर, ना ही पर होता है,
धूप, मिटृ-ओ-हवाओं सी फिरे बंजारन,
लम्हा-लम्हा कोई पहरा, इक डर होता है।
कटे नाख़ुनों सी, कंघी में फंसे केशों सी,
इक रुदाली के उदासी के, स्याह वेशों सी,
इनकी परवाज़ भी तय होती है, दहलीज़ें भी,
जिनकी छूटे ना गुलामी है ये है उन देशों सी।
ना कोई सोच-शिकायत है, ना है चाहत-राहत,
ना कोई ख़्वाब, उम्मीदें, ना है, ज़िद की आदत,
बेटियांं के लिए, तारीख़, सदी, एक से दिन,
सारी दुनिया मे हरेक पल, कोई भेजे लानत।
राहों में मिलती है, साज़िश की नई-नई ठोकर,
ख़्वाब पलकों में निचोए, आंसू से धोकर,
एक अंधेरों का मरुस्थल क्यूँ है बेटी के लिए,
एक बोझिल सी बदरिया, जो बरसती रोकर।
बेटियाँ पलतीं पडा़ैसी का यूँ पौधा बनके,
नाम शादी के ख़रीददार का सौदा बनके,
साज़ो-सामान की मानिन्द कहीं भी भेजो,
आती ये गीली सी माटी का, घरौंदा बनके।
गाय की तरह से बँध जाती है खूँटे से कहीं,
चूल्हे-चौबारों की बेगार से छूटे ना कहीं,
गाँवों-शहरों में कस्बों में गली बस्ती में,
रिश्तों के बोझ से, देखो तो टूटे है कहीं।
मेंहदी क़िस्मत को नए नाम जो लिख जाती है,
साँसें बेटी की, दो हिस्सों में बँट जाती हैं,
शाद-नाशाद हो शादी का सफ़र कौन जाने?
बेटियाँ सुबह कहीं शाम सी ढ़ल जातीं हैं।
सिर्फ़ मुसीबत की ये जाई, ना कहो बेटी को,
ख़ुशियाँ चाहो तो पराई, ना कहो बेटी को,
हसरतें बेटी की हों, हां तो दुआएँ उसके लिए,
शादी हो सिर्फ़ विदाई, ना कहो बेटी को।
क्या-क्या ना खोना पड़ेगा, हमें बेटी के लिए,
कब तलक रोना पड़ेगा, हमें बेटी के लिए,
क्या ये ग़लती है, ख़ता है, गुनाह है, बेटी यहाँ,
शर्मसार होना पड़ेगा, क्यूँ यूँ बेटी के लिए।
आओ लें अज़्म, दुनिया की हर, बेटी के लिए,
रंग भर, ख़्वाब दें, परवाज़ दें, बेटी के लिए,
बेटियाँ, चाँद हैं, सूरज हैं, सितारा भी हैं,
आसमाँ दें, ज़मीं दें, ख़ुशियाँ दें, बेटी के लिए।
बेटियाँ जन्में-जिएँ कैसे, ये हक़ है माँ को,
पैदा बेटी हो कहो, ख़ूब मुबारक़ माँ को,
सारी क़ुदरत भी सलामी दे, उस को हरदम,
बेटी के जन्म पे देगा, जो मुबारक़ माँ को।।
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