सर्द सुबह की धूप शकुंतला-(कविता)

यह कविता मेरीअग्रजा जोधपुर में रहने वालीं ख्यातनाम साहित्यकार डॉ.पदमजा शर्मा ने मेरे नाम लिखी। न जाने कब उन्होंने अपनी आँखों  और दिल के एक्सरे से मेरे भीतर झाँंक लिया! शुक्रिया दीदी ! ढेर सारा प्यार।                                  

सर्द सुबह की धूप शकुंतला     

बहुत अच्छा लगा जयपुर में      
थोड़े से वक़्त में 
बहुत सारा समय
आपके साथ बिताना 
देर रात तक कविताएँ सुनना-सुनाना
आपका मेरे लिए
              कविताओं का चयन करना                        
उन्हें क्रम से लगवाना                           
                                       इधर उधर की बात कर हँसना हँसाना                                  
                      माँ  को याद कर आपकी आँंखों का भर आना                          
दर्द को गुनगुनाना, लिखना,
सहना और हर काम में रम जाना 
कठिन से कठिन रास्ते को 
         सरलता से पार कर जाना         
      हार कर भी हार ना मानना      
                       सर्द सुबह की गुनगुनी धूप सा खिलना                             
सबसे हँसते हुए ही मिलना,जब भी मिलना 
उदासियों के साथ ही सजना-संवरना         
यह हुनर आपसे सीखा            
पर शकुंतला जी! 
क्या यह सच नहीं है कि                            
जब आप गाती है तो गाती नहीं,रोती हैं
हर शब्द आंसुओं से भीगा होता है                                        
हर गीत अतल गहराइयों से उठती 
पुकार जैसा होता है       
माँ के हालात, पापा की याद में शुरू बार होता है                     
हर श्रोता  स्वयं को उस बहाव में बहने देता है                        
जाने वक़्त भी कैसे-कैसे इम्तिहान लेता है?                 
गीत और कविता से भी 
बड़ी है दुनिया आपके मन की           
जितनी आज तक लिखी गइंर् 
उन से दुगनी कविताएँ तो 
वहाँं उग रही है पौधों सी, 
खिल रही हैं गुलाबों सी,                           
उनमें से कुछ चुभ रही हैं शूलों सी 
उन्ही में से चुनें आज फिर एक कविता                                
और गुनगुनाए समवेत स्वर में 
प्यार को इसी तरह पाएं 
और सब पर लुटाएँ।

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