कैसे कहें कथाएँ,तन की, मन की, जीवन की?
कैसे कहें कथाएँ,तन की, मन की, जीवन की?
सच कोई सुनने को कोई तैयार नहीं।
जिधर स्वार्थ हो, झुके उधर ही सुई मान्यता की,
यहाँ असलियत का कोई आधार नहीं।
झेल सके नंगे सत्य के संदर्भों को जो,
इस शताब्दी में ऐसा कोई परिवार नहीं।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की दहलीज़ पर कुछ दिनों पहले ही दिल्ली के प्रतिष्ठित महाविद्यालय में 20 वर्षीया पंजाबी लड़की गुल मेहर का जंग का रास्ता छोड़ कर शांति और वार्ता की राह अपनाने की गुहार लगाना जहाँ उस पर उल्टा पड़ गया, उसी के साथ यह एहसास हुआ कि इस मुल्क़ में अब के फागुन का मौसम अशिष्ट हो चला है। हर तरफ़ फ़िज़ूल के जुमले, नारे, बयानों की जुगाली और बहस के साथ ही ‘‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’’ के नारे के बीच उस शहीद की बेटी को दुष्कर्म की धमकियाँ मिलने का सिलसिला इस फ़िक्ऱ को बढ़ा गया कि बेटियाँ कैसे बचेंगी यहाँ? बताइए क्या हो रहा है इस देश में भला? शिक्षा के मंदिरों में कैसा वातावरण बन जाता है कुछ नादानों के कारण। पिछले दिनों गुलमेहर इस बात को ट्विटर पर कहने पर ‘‘कि मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा है’’ बड़ा ही गंभीर मानते हुए चंद छात्र राजनेताओं ने हंगामा खड़ा कर डाला। हमेशा की तरह उन गिने-चुने राजनीतिक चेहरों को बुलाकर कुछ चुनिंदा टीवी चैनलों ने अपनी संध्या चौपालें बुलाई और उनमें ऐसी-ऐसी अनर्गल बातें बोली गई जिसने देश की हवा में ही नहीं कई ज़हनों में ज़हर घोला। सिंहासन पर बैठे त्यौंरियाँ चढ़ाकर सब पर बरसते हुए, अपने चैनल की चौपालों में वाकयुद्ध को बढ़ाते एंकर पत्रकार नहीं कोई तानाशाह प्रतीत हुए। हमारी प्राचीन परिभाषा जो नारी के संदर्भ में हैं ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’’ अब बदल चुकी है, पूजने की बात तो छोड़िए अब तो सरेआम नारी को लूटने की बात की सामने आ रही है। इस बीमार चमन को देख कर मन में सवाल होता है कि क्या देश में दया, करुणा, सोहार्द, सहिष्णुता, संयम जैसे मूल्य केवल क़िताबों में ही रह गए हैं?
न जाने क्यों इस मसख़री सी सदी में
सब ने गंदी कर डाली अपनी अपनी निर्मल चादर
अब सब को चिंता है केवल दूसरे के लिहाफ़ की।
एक अंधेरे के गाजे-बाजे में कौन सुने भाषा खि़लाफ की़? लोगों का हुजूम इन मुर्दा तमाशों को देख देख में मुल्क़ बदल रहा है दुभाषियों व झंडाबरदारों की यहाँ-वहाँ यह ज़हर उगलती सर्पीली जु़बानें समाज में माहौल बिगाड़ रही हैं और उधर बेसुरी बीन बजाने वाले, सभा में लंगर लड़ाने वाले शातिर थोथे, वाचाल पत्रकार इस देश समझ रहे हैं पता ही नहीं चल रहा! एक बड़े हो हल्ले के साथ काले और उजाले में अजीबोग़रीब मंत्रों की भाषा में रात दिन खींचातानी होती देख यहाँ आजकल गांधी की शांति के लाठी सज़ायाफ़्ता प्रतीत हो रही है। लगता है......
अब गया समय अपनेपन का, इज़्ज़त का, भरोसे का, बात-बात में भाव ताव, लूट-खसोट, छीना-झपटी के व्यापार में, लेने को स्वारथ-देने को धोखा। गाहे-बगाहे... देश का बेड़ा अटके-खेवनहार ही भटके।
सत्य सभी को खटके, झूठ बड़ा ही मटके।
अब खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, घायल तो खरबूजा ही होता है। बस यही बात इस दौर में आधी आबादी पर लागू हो रही है। संघर्षों की ढीली प्रत्यंचा चढ़ाए सदियों से यहाँ आधी आबादी के चिंताओं के बादल न कम हुए, न हो रहे हैं। अपने कंधे पर दर्द की भारी शीलाए एँ ढोते हुए फ़रियादी सूरत में घर-बाहर संकट की कारा काटते हुए हलाहल के प्याले पीती, दिलों में छालों की सैकड़ों टीस समेटे वेदनाओं के अनेक मंत्र बाँचती आधी आबादी जीवन की फटकारें झेल रही हैं उनका जीवन संसार मरुस्थल का आदी हो चला है, जहाँ कोई मकरंद नहीं! उनकी आँखें आंसू की आदी हो चली है जहाँ कोई सपने नहीं! इस धृष्टराष्ट्रीय युग में हर दिन के कोलाहल में घायल, सुलगते मन को लिए इस मुल्क की अनेक रुदाली सी स्त्रियाँ वेदना से बोझिल हैं, मगर अपने दर्द को बयान नहीं कर पाती। इस देश की स्त्रियां सच कहूं तो सुंदर भवनों में खड़ा एक ऐसा तुलसी चौरा है जो घरों के आंगन में यूँ तो ख़ामोश खड़ा रहता है मगर कभी सुबहोशाम पूजा भी जाता है तो अपनी ही ज़ात के हाथों। वरना सदियां बीत गई वह वैसे ही खामोश खड़ी रहती हैं। हमें वे पूजा वाले हाथ बढ़ाने होंगे उन हाथों को ताकत साहस संबल और हौसलों की बुलंदी देनी होगी तभी हम किसी से भी गुलमहर सी लड़की को फ़िज़ूल ़धमकियों का सही जवाब दे पाएंगे और उसे डर के हार के घर पर ना बैठने देंगे। नहीं होने देंगे निशाना किन्हीं असामाजिक तत्वों के फ़तवों का। इस सदी में महिलाओं को संकल्प लेना होगा कि वे जागेेंगी आक्र दूसरी स्त्री का हाथ पकड़ उस को हौसला देंगी। समवेत स्वरों में गायेंगी......
ख़ूब झुलसी सूरज की उस तपिश से
देह में मुझे अब चांदनी उगानी है।
मैं सदानीरा नदी हूँ, दर्द की,
सुख भरे गीतों की रागिनी सजानी है।
किस तरह निर्वंश होने दूँ मैं इस सृष्टि को?
मुझ को एक एक कोख की कन्या बचानी है।
न जाने क्यों इस मसख़री सी सदी में
सब ने गंदी कर डाली अपनी अपनी निर्मल चादर
अब सब को चिंता है केवल दूसरे के लिहाफ़ की।
एक अंधेरे के गाजे-बाजे में कौन सुने भाषा खि़लाफ की़?
क्यों हमारा समाज एक नेगेटिव सिंड्रोम डिसॉर्डर में ?
बहुत चिंतनशील लेख ।
ReplyDeleteकाश ! कुछ आँखें खुलें ,किसी को शर्म तो आए, वर्ना इस हमाम में सब एक से ही तो हैं।
डॉ.प्रणवभारती
अहमदाबाद