ग़ज़ल- नज़्म

ए हिन्दुस्तान के लोगों सुनो,बेटी को पराई मत कहना


यूँ दूर बड़ी परदेस में माँ,
पलकों पे बैठी रहती है
अब एक अकेली तन्हा वो,
वीराने सहरा में रहती है
जब त्यौहारों के दिन आएँ,
ख़ामोश वो चुप-चुप रहती है
घर-घर में जब ख़ुशियाँ हँसती तब,
मेरी माँ की आँखे झरती हैं।

जब बाबुल थे धड़कन-धड़कन
तब माँ त्यौहार सी लगती थी
श्रृंगार था उसका इक बिन्दिया
चूड़ी-पाजेब में सुर भरती थी
हाथों में मेंहदी के बूटे
गोटे की साड़ी जँचती थी
मंतर घर की ख़ुशहाली के
माँ लम्हा-लम्हा जपती थी।

माँ बिना तेल की बाती सी
धू-धू करती अब जलती है,
जैसे ख़ुशबू के बिन कोई
फुलवारी ज़िन्दा रहती है।
करुणा, ममता से रिश्तों की
हर बन्दनवार सजाती माँ
देखा, पी कर सब रंजो-ग़म
पुरखों की रीत, निभाती माँ
आँखों-आँखो में पलते हम
बुरी नज़रों से भी बचाती माँं 
नींदों मेंख़्वाब में डरें ना हम
सिरहाने चाकू छिपाती माँ
बदरी बन के यूँ दुआओं की
हर मुश्किल से लड़ जाती माँ

अब मैं हूँ यहाँ और माँ है वहाँ
यादों से धड़कन जलती है
रहती हूँ अपने पी के घर
पीहर में आँखे रहती हैं।

माँ जैसी जहाँ में कितनी मां
जिनपे छाई तन्हाई है
बाबुल के दीदे मुंदते ही
पलकों पे मां के रुलाई है
चलना सिखलाया अंगुली पकड़
उस पूत ने अंगुली दिखाई है
मां सूने घर में हादसे सी,
ना मैं ना वो बहनें- भाई है
मां रोए ना आंसू पौंछ सकूं
मजबूर क्यों बेटी बनाई है
अपनी दुनिया होकर भी मां
अपनी दुनिया में पराई है

भरे पूरे कुनबे वाली माँ
क्यों आहट ख़ातिर मरती है
पल-पल बतियाती बोलती जो
बन्द होंठ में बातें करती है

तेरी ख़िदमत कैसे पाऊँ माँ
यूं देख तुझे मुरझाऊँ माँ
 मन ही मन नित कलपाऊँ माँ
किसको दिल चीर दिखाऊँ माँ  
तेरे दिन कैसे लौटाऊँ माँ
तुझ तक कैसे उड़ आऊँ माँ  
घर छोड़ के कैसे जाऊँ माँ  
तेरे नाम को कैसे डुबाऊँ माँ

माने हैं पराई जाई को
उस रीत को ना क्यूँ तजती 
मेरे काँधे-देहरी छूने को
किन लोगों से तू डरती माँ 
बाबुल बिन्दिया बन लौट आओ
माँ को सिन्दूरी रंग फिर दो
वो लाल रुपहरी तारों की
चूनर माँ के माथे धर दो
सरसब्ज़ करो मेंहदी बूटे
माँ को खिली फुलवारी कर दो
माँ की सूनी सी आँखो में
सपने उम्मीद के सौ वर दो
माँ ने भुगता तुम बिन दोज़़ख़
आकर अपना, साया सर दो
फिर ख़ुशियाँ उसकी उड़ान भरे
वो पंख दो, बाबुल वो पर दो

पतझड़ सी लगे, जो बहार थी माँ
ना जीती अब, ना मरती है
बाबुल आ जाओ फिर से तुम
बेटी ये मिन्नत करती है।

ए हिन्दुस्तान के बेटों सुनो!
माँ को तुम तन्हा मत करना,
ये पाप है रब को, छलने सा
इस पाप के भागी मत बनना!!

ए हिन्दुस्तान की माँओं सुनो!
बस बहुत सहा, अब मत सहना
सृष्टि जीवन आधार हो तुम,
रब का और मेरा भी कहना!!

ए हिन्दुस्तान के लोगों सुनो!
सगदिल तुम ऐसे मत बनना,
शादी के नाम पे बेटी को
हरदम की विदाई मत कहना!!

ए हिन्दुस्तानी बेटी कहो
माँ अब तुम तन्हा मत रहना
ग़र पूत तुम्हारा हो न सका
मां मेरी पलकों पे बसना
कहना दिल धड़कन में रहना
पग मेरी देहरी पे धरना
बची साँसे बोझिल मत करना
बेकार की रीत में मत पलना
अब आज मैं महफिल में कह दूँ
बेटी को पराई मत कहना
देती हूंँ सौंगन्ध अब सबको
बेटी को पराई मत करना


लड़की

         
  इस ज़ालिम दुनिया में, कंगाल है ये लड़की, 
जिस सिम्त नज़र डालो, बदहाल है लड़की। 
अफ़वाहें सारी हैं, ख़ुशहाल है ये लड़की, 
सब मानें हक़ीक़त में, जंजाल है ये लड़की। 
इस दौर ने बदला है, माँओं की हक़ीक़त को, 
अब कोख में ना महफ़ूज़ हलाल सी ये लड़की।
माँ बाप को फिक्ऱ हुई, रातों की नींद उड़ी, 
कहीं कोई उठा ना ले, रूमाल है ये लड़की। 
हर जग़ह लोगों ने, ज़हनों से उतारा इसे
जैसे कि ग़लत कोई, ख़याल है ये लड़की। 
आधी दुनिया ने इसे, कहने को देवी कहा,
गाली की सवारी बना कहा, माल है ये लड़की। 
समझे ना कोई इसको, जाने ना इसे कोई, 
घर की मुर्गी के बराबर, दाल सी ये लड़की। 
घनियारे जंगल में, वहशी जो जानवर हैं, 
वहाँ घास का हरा-भरा पुआल है ये लड़की। 
हर उम्र के सहरा में, तन्हा-तन्हा है सफ़र, 
कोई ना पूछे कभी, किस हाल है ये लड़की। 
ना चाहे ना याद करे, ना बुलाए क़रीब कोई, 
जैसे कि हादसों का, बुरा साल है ये लड़की। 
मैं कहती जहाँ को, ये वरदान है ये घर-घर में, 
रौनक़ है शहर और गाँव, कमाल है ये लड़की। 
सर्दी,गरमी,बरखा या कोई वो मस्त बहार, 
हर अलबेली रूत की, इक चाल है ये लड़की। 
पत्थर-कंकर के शहर, जहाँ धूप घनेरी है,
ख़ु़शबू से भरी फूलों की, इक डाल है ये लड़की। 
कोई माने ना माने, कुंकुंम-रोली ये चराग, 
भगवान की पूजा का, इक थाल है ये लड़की। 
ये सरगम, गीत ग़ज़ल, आँगन की शहनाई, 
रिश्तों के जख़ीरे में, सुरताल है ये लड़की। 
लड़की का है न जवाब, कोई हल कर दे जानें, 
उलझी सी पहेली ये, सवाल सी, ये लड़की। 

शब्दों ने बनाया तुम्हें, मुझ में ही ढ़ाल कर।


कु़दरत ने बनाया तुम्हें, ममता में ढ़ाल कर,  
ममता ने बनाया तुम्हें, इज़्ज़त में ढ़ाल कर। 
इज़्ज़त ने बनाया तुम्हें, बन्धन में ढ़ाल कर, 
बन्धन ने बनाया तुम्हें, दर्दां में ढ़ाल कर। 
दर्दों ने बनाया तुम्हें, पत्थर में ढ़ाल कर, 
पत्थर ने बनाया तुम्हें, चाहत में ढ़ाल कर। 
चाहत ने बनाया तुम्हें, औरत में ढ़ाल कर,  
औरत ने बनाया तुम्हें, मर्दों में ढ़ाल कर। 
मर्दों ने बनाया तुम्हें, साये में ढ़ाल कर, 
साये ने बनाया तुम्हें, स्याही में ढ़ाल कर। 
स्याही ने बनाया तुम्हें, शब्दों में ढ़ाल कर, 
शब्दों ने बनाया तुम्हें, मुझ में ही ढ़ाल कर।


लड़की का क्या है? 


ये लड़की तो लड़की है, लड़की का क्या है? 
ये क़ुदरत की ग़लती, तो ग़लती का क्या है?? 
     
क्यों झोंका उदासी का पतझड़ है लड़की? 
क्यों खोखा है  बोझिल से ज़िम्मों का लड़की? 
क्यों रोका सभी ने, जो बढ़ती है लड़की? 
झरोखा अंधेरों का, पाबंद लड़की। 
  
क्यों ग़म भर की छाया, ये कहलाई लड़की?  
क्यों अश्कों का साया क्यों अनचाही लड़की? 
क्यों धन है पराया समझते हैं लड़की? 
पड़ौसी का पौधा क्यों कहते हैं लड़की?? 
  
उधारी का सरदर्द सुनते क्यों लड़की? 
क्यों चिड़िया,क्यों मेहमां ,क्यों बंधन है लड़की? 
कटे पर सी उड़ती परिन्दा है लड़की? 
बिना घर सी रहती, क्यों ज़िंदा है लड़की?? 
  
क्यों लगती है, बेबस सी, लाचार लड़की? 
क्यों सजती ह, बाज़ार-बाज़ार लड़की? 
क्यों सहती, सितम,ज़ुल्म हर बार लड़की? 
क्यों मरती है, मजबूर बेज़ार लड़की ??
  
क्यों जनने से पहले ही जंजाल लड़की? 
क्यों मातम की धुन और सुरताल लड़की? 
क्यों सदियों के ज़ुल्मों से, बदहाल लड़की? 
फटेहाल, बेहाल, कंगाल लड़की?? 
  
क्यों चुभती कटारी सी, सुब्हो-शाम लड़की? 
क्यों उजड़ी सी क्यारी, क्यों गुमनाम लड़की?

 क्यों चिंता की वादी, ज्यों चुपचाप लड़की? 
अहिल्या की शिला ज्यों, इक श्राप लड़की? 
क्यों डरतें हैं नादान, ज्यों पाप लड़की? 
क्यों माना कि घर में, बसा साँप लड़की?
    
हक़ीक़त की तहरीर इक ख़्वाब लड़की 
चमकती सी शमशीर मेहताब लड़की 
  
मैं कहती जहाँ को कि वरदान लड़की, 
ये हर घर के आँगन की, इक शान लड़की, 
ये बेटों का बुन देती, अरमान लड़की, 
ज़ख़ीरा है रिश्तों का, फ़रमान लड़की।। 
  
ये मेंहदी, ये कुमकुम, ये श्रृंगार लड़की, 
पिया घर में, पीहर मे त्यौहार लड़की। 
  
ये बाबुल की बन के, दुआ आती लड़की, 
ये माँ की ही सूरत में ढ़ल जाती लड़की, 
ये आ के कलाई पे बँध जाती लड़की 
ये सजना की दुनिया ही बन जाती लड़की 
  
है आँगन की तुलसी, हवन राख लड़की
ये मंदिर की मूरत सी है पाक़ लड़की 
  
ये क़़ुदरत की नेमत ओ गुलज़ार लड़की 
ये ख़ुशियों का प्याला, छलकदार लड़की 
है झिलमिल उजालों की झंकार लड़की 
है महफ़िल ना दमदार, जो ना हो लड़की 
  
ये वेदो-पुराणों की गरिमा है लड़की, 
ये हर ग्रन्थ, गीता की महिमा है लड़की। 
  
ग़ज़ल,शायरी है कहानी है लड़की, 
ये वीणा, ये सरगम,ये वाणी है लड़की, 
है तक़दीर, क़िस्मत, मेहरबानी लड़की, 
ये अम्बा, भवानी, ये कल्याणी लड़की।। 
  
ये लड़की तुम्हारी है लड़की सभी की, 
ये ग़लती तुम्हारी ना ग़लती किसी की।। 

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