मैं इसलिए जिंदा हूं कि मैं बोल रही हूं।

''मैं इसलिए ज़िंदा हूं कि मैं बोल रही हूं दुनिया किसी गूंगे की कहानी नहीं लिखती" वाक़ई अगर हम ज़िंदा हैं तो ज़िंदा नज़र आना भी ज़रूरी है । मगर देश और दुनिया के बदलते हालात में ज़िंदादिली से ज़िंदा रहना अब आसान नहीं है। इधर सियासत और हुूक़ूमत के बेढ़ंगे तेवर, उधर मीडिया की बेसिर पैर की 24 घंटे की बकबकाट और रोज़ाना की आम-आवाम की कुलबुलाहट, बढ़ती हुई  परेशानियों और तक़लीफ़ों को देखते हुए लग रहा है कि अब आने वाले दिन मुश्किलात भरे होंगे ।  जहां भी देखिए तो यह नज़र आता है कि "जो बे ज़मीर रहे बाज़मीर बन बैठे वो आज मालिके- तकदीर बन बैठे। वह दूध बेच कर रहा साइकिल पर, शराब बेचने वाले अमीर बन बैठे।" अब इस सदी में दो काम आसानी से किए जा सकते हैं......या तो क़त्ल कर डालो इन सारे ज़िंदा ज़मीरों को,फिर तो आसान होगा लाशों पर हक़ूमत करना ।।   या फिर.... फनकार  हो तो हाथ में सूरज सजा के लाओ,बुझता हुआ दिया ना मुक़ाबिल हवा के लाओ।। असल में हो यह रहा है इस मुल्क में कि "हर तरफ माचिसों के बाज़ार है और हर आदमी जली हुई तीली लिए बैठा है।" कहां गया हमारा पंचशील का वह मंत्र,कहां गई हमारी वह अनेकता में एकता? कहां गई हमारी क़ौमीयक़जहती के सुहाने क़िस्से? कहां गया हमारा भाईचारे सद्भावना और सहिष्णुता के रागों का सुरीला पन? कहां गया बुजुर्गों की इज़्ज़त और ख़िदमत का वह दिलली जज़्बा? कहां गए वो लुभावने मौसम -रितुए ? कहां गए हो शिक्षा के देवालय वो गुरुकुल। कहां गए वे बेनज़ीर लोग जिनकी मौजूदगी भर से सुक़ून, संबल ,राहत का एहसास हुआ करता था ।  आज स्वार्थ की आंधी,लालच के चश्मों,व्यक्ति वादिता के असर ,खाओ -पियो -मौज करो के अमर मंत्र जाप ने  हमारी दुनिया को, हमारी क़ुदरत को इतना बदल डाला है कि हमें ने पड़ोस दिखता है ना बड़े बुजुर्गों के बुझते -मुरझाते चेहरे और न  ही दुनिया भर में बदलता हुआ क़ुुदरत का रंग ढंग ।  "अपनी -अपनी अंगुलियां, अपनी -अपनी रोटियां बाप दिन गिन रहा है बेटा उसकी रोटियां ।"  ऐसे दौर में हर काम के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए दलीय- राजनीति के कुचक्रों के शिकार हम ,रात-दिन सरकारों को फ़िज़ूल कोस रहे हैं। पर इसका क्या फ़ायदा?                  "सुना है कि दुनिया बड़े आराम से सो रही है शायद हश्र के दिन जागे  "?अब बात तो यही है कि सोने वालों को तो एक बार जगह भी लेते ,जाग के सोए थे उनको जगाएं कैसे ? इस सदी में इस तंगदिल, संगदिल ज़माने में मरे हुए ज़मीर के साथ कीड़े -मकोड़ों की सीे ज़िंदगी जीने से तो बेहतर है कि हालात से मुक़ाबला करती हुई ज़िंदगी को बेनज़ीर बनाते हुए नई नस्लों को कुछ अच्छा, बेहतरीन माहौल देने की की चाहत में, बिगड़ी हुई क़ुदरत को संवारते हुए, उम्मीदों -ख़्वाबों को अपनी -अपनी हथेलियों पर ज़िंदा किया जाए और खु़दगरजियों से ऊपर उठकर देश और दुनिया को संभाला जाए ।क्योंकि...... अगर हो आदमी झूठा तिजारत डूब जाती है /अगर दिल आदमी का हो काला इबादत डूब जाती है ,/  किसी मजबूर की आंखों में जब आंसू आते हैं'/ यह सैलाब वो है जिसमें हुक़ूमत डूब जाती है।   

 डॉ.शकुंतला सरूपरिया

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