सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा।


 सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा हम बुलबुले हैं इसकी यह गुलसितां हमारा । *भारत जैसे इस सांस्कृतिक आ आर्यवर्त में इन दिनों मीडिया के फलक पर "मी टू "नाम के कृष्ण् का एक डिजिटल अवतार आया है जिसकी बांसुरी के मद्धम स्वरों से ही इस सभ्य समाज में ऐसा तूफान आया है ,जिसे कुछ लोग बासी कढ़ी ने उबाल का नाम दे रहे हैं। रामायण में सीता के हरण और महाभारत में द्रोपदी के चीर हरण की नाजायज़ घटनाएं सिद्ध करती है कि उस सतयुग  में भी  प्रतिष्ठित राज घराने की स्त्रियां भी  सुरक्षित नहीं थीं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम  की परछाई होने के और लक्ष्मण की लक्ष्मण रेखा खींच जाने के बावजूद  सीता का हरण हो चुका था और भरी सभा में पांच -पांच पांडव पतियों और सभी बड़े बुजुर्गों की मौजूदगी में दुर्योधन ने द्रौपदी का अपमान कर उसका चीर हरण किया। ख़ैर उस युग में तो भगवान राम और भगवान कृष्ण ने सीता और द्रौपदी को किसी तरह बचा ही लिया था । परंतु उस समय भी एक धोबी के कथन मात्र से बाद में भगवान श्री राम को गर्भवती माता सीता का त्याग करके अपने महल से वन जाने को कहना पड़ा था।  इस कलयुग में पिछले कुछ दिनों में ग्लैमर ,फिल्म, पत्रकारिता और राजनीति और  दुनिया के चंद चर्चित लोगों पर कुछ महिलाओं ने बोल।बोल्ड होकर छेड़छाड़ और दुष्कर्म के आरोप से सरेआम हआरोपित किया है और उनको कटघरे में खड़ा करके सबके नज़रों के सवालों के कटघरे में ख़ुद खड़ी हुई है। मी टू नाम के कृष्ण की अंगुली थामे महिलाओं के द्वारा बड़ी हस्तियों को यौन शोषण के मामले में आरोपित किये जाने पर सब लोगों में यह सवाल बवाल की तरह उठा है कि इतने बरस वो अबोली क्यों रही?  मैं तो तटस्थ सभाव से यहां पर यह कहना चाहूंगी कि मैं नहीं जानती कि आरोप लगाने वाली यह महिलाएं सच बोल रही है या झूठ या फिर कि सभी आरोपित पुरुष निर्दोष हैं या  फिर अपराधी?  किंतु यह सच है कि सतयुग की  लौकिक छत्रछाया में सीता और द्रौपदी से अलग  कलयुग के इस लौकिक  परिवेश में यहां महिलाएं सुरक्षित नहीं है। वे हक़ीक़त में  दोयम  दर्जे पर हैं और हर समय भय और असुरक्षा के माहौल में वे भरोसे और विश्वास से किसी ना किसी मुसीबत में पड़ जाती हैं। सच तो यह है कि आज के तथाकथित सभ्य  व्यक्ति सुसंस्कृत परिवारों में भी जन्मदायिनी मां की कोख से ही एक बेटी पर से सुरक्षा का कवच  हटा दिया जा रहा है। अब तो बेटी को जन्म देना मानो उस पर एहसान माना जा रहा है। आधुनिकता के साथ इस तेज़ रफ़्तार जमाने में आज भी सुरक्षा और छत के लिए एक बेटी को किसी ने किसी पुरुष का सहारा लेना होता है। "न जानें क्यों लड़कियों के अपने घर नहीं होते ,जो उड़ना चाहे अंबर पर तो अपने पर नहीं होते।"  एक औरत इस दुनिया को जन्म तो देती है पर ख़ुद के जन्म लेने के बाद किसी की दुनिया नहीं बनती। यहां पुरुषों को मां बहन पत्नी बेटी के रूप में सताए जाने का लाइसेंस न जाने कौन दे देता है ? यह एक विचारणीय प्रश्न है। एक बेटी के जन्मते ही एक मां अपने चेहरे पर दो इंच मुस्कान नहीं ला पाती। यहां तक कि बेटी के जन्म ते ही घर बाहर  रिश्तेदार पड़ौसी आज भी मुंह लटका लेते हैं । यहां यह भी कहा गया है कि औरतों उस रोटी की तरह होती है जिसे भीतर रख दे तो सूख जाती है ,बाहर रख दो तो बंदर लूट जाते हैं। और एक  बेटी के रुप में जन्म लेने का वो  जाने कितनी बार मरते हुए ऋण चुकाती रहती है ।"शाद नाशाद हो शादी का सफ़र कौन जाने? बेटियां धूप कहीं सांझ सी ढल जाती हैं"। आज मीडिया के फलक पर मी टू के कृष्ण की अंगुली को थामे इक्का दुक्का महिलाएं हिम्मत करके अपने साथ हुए यौन शोषण और अत्याचार दर्द को चीख चीख कर बता रही है । अगर तमाम भारतीय परिवारों में खंगाला आ जाए तो भी टू के उंगली थामने के लिए निश्चित रूप से असंख्य बेटियां बहुएं  ज़रूर सामने आएंगी जो अपने इर्द-गिर्द के परिवार में , कार्यालयों में कार्यस्थलों पर जाने- पहचाने पुरुषों की बद नीयति, चालाकी ,लंपटता कि शिकार हो चुकी हैं । यह कहने में भी मुझे गुरेज़ नहीं है वर्तमान में साहित्य  समाज में सम्मान पुरस्कार व नाम कमाने की होड़ में तथा कवि सम्मेलन के मंचों पर मां सरस्वती की गोद में जबरन बैठेे कुछेक प्रतिभा हीन से लाड़ले लाडलियों  की अमर्यादित शैली असंख्य सच्चे और अच्छे कवियों और साहित्यकारों एक कीर्ति पंखो को नुकसान पहुंचा रही है। फैशन व फिल्म एवं टीवी धारावाहिकों की दुनिया में पिछले वर्षों में अनेक सुंदर युवतियों ने पुरुष साथियों की बेवफाई में आत्महत्या कर ली।   हरियाणा  के रागिनी मंच   की  एक युवा नृत्यांगना  की  सरेआम हत्या कर दी गई। उधर हरियाणा व राजस्थानी की कुछ महिला कलाकारों की एक दूसरे को नीचा दिखाते हुए धमकी देते हुए आपसी रंजिशों  के वीडियो भी फेसबुक  यूट्यूब  चैनल पर दिखाई दीं। कहने का आर्थ यह है कि छुरी तरबूज पर गिरे यह तरबूजा छुरीे पर जख्मी और घायल तरबूजा ही होता है। इसमें कोई शक नहीं कि मी टू नामक डिजिटल कृष्ण की  अंगुली थामने अगर कोई महिला 20-25 वर्षों के बाद अपने साथ हुए दुष्कर्म के लिए आवाज़ उठा रही है तो यह सब इस सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के मुंह पर एक तमाचा है कि उसने अब तक के पीढ़ी ताकि घायल मन और देह लिए हिम्मत और संबल का कोई मरहम नहीं इजाद किया कि वह अपने प्रति हुए किसी जुल्म के प्रति कभी आवाज़ भी उठा सके।      ये बेटियां हैं दासियां कहां रानियां सी  बेटियां, नहीं देवियों सी  बेटियां बस बेटियां हैं बेटियां, हर जिनके निशाने पे निशानियां सी बेटियां। जीने तो दो बस जीने की दीवानियां सी बेटियां।

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