गीत
युग का हरकारा बोल गया।
वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं, युग का हरकारा बोल गया।
वह समय नहीं, वह लोग नहीं, मन का इकतारा बोल गया।।
मिले पग पग पर दु:ख के छाले कुंठित क्यों मनुज का राग हुआ,
हर सांस-सांस पीड़ा पाले, हर ओर वेदना का झाग हुआ।
नहीं जीने योग्य यह काल रहा, विचलित जग सारा बोल गया।
वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं युग का हरकारा बोल गया...
हर आत्मा के तट पे बोझा है बोझे से जीवन बोझिल है,
नश्वर जीवन के समदर में, मोहित तन- मन बड़ा चोटिल है।
मरघट-सी है क्षण-क्षण लहरें, वह समदर ख़ारा बोल गया।
वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं, युग का हरकारा बोल गया...
हर ओर उदासी की रुत है, छिपी नैन अश्रु की नदियां,
धरती हो गगन नित करें विलाप, रोएं दिन ओ शापित रतियां।
इस लोक में राम तो बचा नहीं, सकता कोई राम का प्यारा बोल गया।
वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं, युग का हरकारा बोल गया...
विश्वास में स्वयं ही जोग लिया,
सत्ता है झूठ की घर-घर में,
पाताल में उतरा मनुज धर्म, नैतिकता भटके दर-दर में।
वह राम ही जग में तारेगा,
सच गुरु हमारा बोल गया।।
वह सत्य नहीं, सद्भाव नहीं युग का हरकारा बोल गया...
वह समय नहीं वह लोग नहीं मन का इकतारा बोल गया।।
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