अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे?
अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे?
तेज धूप की तपिश में कैसी मधुमासों की बातें?
किसको भली लगेंगी मिथ्या विश्वासों की बातें?
हमको कथा सुनाके सीता और झांसी रानी की,
संत सरीख़े लोग करें अब हमसे झांसो की बातें!
अभी-अभी दशहरा बीता, हर साल की तरह ही पूरे देश के कोने-कोने में रावण के पुतले जलाने का जश्न यूं मनाया गया जैसे कि रावण तो सदियां पूर्व ही ख़तम हो गया। मगर यह क़तई सच नहीं है। आज जब दिन रात मीडिया के ज़रिये सालों से पूजित धर्मगुरु आसाराम और उनके पुत्र नारायण प्रेम सांई के कृत्यों का जिस तरह का नित नया खु़लासा देखने को मिल रहा है उससे सबके सब भयभीत और चकित हैं कि रावण के अंश अभी भी मौजूद हैं। यानि सीताओं का हरण करने वाला रावण अभी मरा नहीं है। वहीं आज भी द्रोपदी का सरेआम चीर हरण करने वाले दुर्योधन भी इस देश की अनेक शरीफ़ बस्तियों में छिपे हुए हैं और रात के उजाले को दिन में, दिन के उजाले को रात में बदलने में माहिर वे शातिर दुर्जन दुर्योधन कहीं नन्हीं बच्चियों को, कहीं किशोरी और युवतियों को,और कहीं कमज़ोर तन्हा औरतों का चीरहरण कर रहें हैं जिसकी ख़बरें पढ़ सुन कर दिल छटपटाता है, मगर उन दरिन्दों का छोड़िये, दिल तो तब रोता है जब सारी श्रद्धा और आस्था के महल तोड़कर आसाराम सा तानाशाह सा इंसान अपनी विभत्स तस्वीर और अपराधिक छवि के भेद खुल जाने के बावजूद जे़ल से सीडी के ज़रिये स्वयं के निर्दाष होने का दंभ भरता दिखाई देता है।
बात घर द्वारे की होती तो पल्ला झाड़ लेते,
क्या करें आसमान मैला हो गया!
देश के दुर्दिन आगये लग रहा है क्योंकि इन सन्त सूरत लिये रावण सी सीरत के निकृष्ठ इसांनों ने वहशियाना वारदातों को ऐसा अंजाम दिया है और लगता है कि.....अंधेरा बढ़ गया है।...
बेपर्दा हो यक़ायक़ उतर गये वे दिलों के रास्ते,
बंद आंखों से कितने लुटा बैठीं अस्मत उनके वास्ते,
जाने कौन यहां अपनी बेटियां मैली कर दें?
चारों तरफ़ है ख़ौफ़ अब है बस ख़तरो के रास्ते।
दशहरे से पहले नवरात्र के दिनों में इस देश में कई लोग कन्या पूजन-व्रत उपवास का ढ़ोंग सरेआम रचते दिखाई देते हैं मगर असल में वे ही लोग घर की स्त्रियों की कोख में आई अपनी नन्हीं बच्चियों के भ्रूण चुन चुन कर चिकित्सकों को उनकी मौत की सुपारी दे देते हैं। वहीं अगर वे बच्चियां जीवित भी रह जाती हैं तो उनके सिर पर अनेक मुश्किलात अनेक परेशानियां मंडराती है वे ताउम्र पुरुषों के समान आज़ादी से बेख़ौफ़ नहीं जी पातीं। क्योंकि नित नये दशानन यही जन्म ले रहे हैं। शरीफ़ लोगों में एक मुर्दनी सी छाई हुई है वहीं हरेक आंख ख़ुद अपनी ही फ़िक्ऱ में नम है, किसी को ज़ख़्म दिखाने का फा़यदा ही नहीं।आसाराम व उनके पुत्र के आश्रम से जुड़े साधक ख़ासकर बेटियों के माता पिता अपने आस्था के महल ढ़ह जाने से भयभीत भी हैं और चितिंत भी।
किसे पड़ी है यहां कौन सीता का सत्कार करे?
अब राम मिले न मिले, कौन इन्तज़ार करे?
बिगड़ रहे हैं हालात द्रौपदियों के फिर
है कहां कृष्ण जो अर्जुनों को तैयार करे!ै
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