हिंदी है नाम इसका, भाषा यह हिंदुस्तानी है।’’
हिंदी है नाम इसका, भाषा यह हिंदुस्तानी है।’’
विहरो बिहारी की विहार वाटिका में चाहे,
सुर की कुटी में जा के आसन जमाईये।
केशव के कुंज में किलोल-केलि कीजिए,
तुलसी के मानस में डुबकी लगाइये।
भिन्न भाषा भाषियों! मिलेगा मनमाना सुख,
हिंदी के हिंडोले में जो कभी बैठ जाईये।
कोई भी भाषा हो वह हमारी अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम हुआ करती है इस देश में वर्षों से 14 सितंबर को राज भाषा-यानी हमारी मातृ भाषा हिंदी दिवस के रूप में उत्सवपूर्ण तरीक़े से मनाया जाता है। यही वह दिन है जब हम हिंदी भाषा के महत्व उसकी गरिमा उसके वर्चस्व को स्वीकारते हुए संप्रेषण के इस सुंदर माध्यम की अखंड भारत में वंदना करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार इस बात को दोहराया जा रहा है कि हमारी मातृभाषा हिंदी का अस्तित्व दूसी कुछ भाषाओं के कारण ख़तरे में है यह भी बात मुख्य रूप से कही जा रही है इस देश में एक दिन हिंदी के नाम पर एवं शेष दिवस सब हिंदी की अवहेलना में लगे रहते हैं। जबकि सच्चाई यह नहीं है भारत को एक सूत्र में पिरोये रखने में 17 उपभाषाओं को मिला कर बनी हिंदी भाषा की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है।
‘‘हिंदी है नाम इसका यह भाषा हिंदुस्तानी है,
दुष्यंत की ग़ज़ल है यह मुंशी की कहानी है।
दादू, क़बीर, मीरां सा परिवार है हिंदी का,
रसख़ान, सूर, रहीम सा संसार है हिन्दी का,
माँ भारती की लाड़ली संतो की बानी है।
हिंदी है नाम इसका, भाषा यह हिंदुस्तानी है।’’
सच्चाई तो यही है कि विद्यालयों में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के बावजूद आम भारतीय परिवारों में बातचीत का माध्यम अक्सर बच्चों से लेकर बड़ों तक हिंदी ही है क्योंकि अंग्रेजी और कान्वेंट विद्यालयों के नई पीढ़ी के बच्चे भले ही अंग्रेजी भाषा में अपने सभी विषय पढ़ते हों, मगर घरों में आज भी उन्हें हिंदी में इसलिये बातचीत करनी पड़ती है क्योंकि उनके माता-पिता उनकी तरह अंग्रेजी भाषा में उस तरह पारंगत नहीं है और यही बात आज के इस वातावरण में हिंदी को प्रभावशाली भाषा साबित करती है ।
‘‘शब्दों की सरलता हिन्दी की पहचान बन गई।
अंग्रेजी की साजिश से वह अनजान बन गई।।
इसे सौभाग्य कहें कि देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों में दिखाए जा रहे सभी हिंदी धारावाहिकों में प्रयुक्त हिंदी भाषा देश के दक्षिण प्रांतों में भी हिंदी को सरलता -सहजता से घर-घर तक पहुँचाया है। हिन्दी में हमारे देश में आये दिन देश के कोने-कोने में कवि सम्मेलनों का आयोजन भी इस की लोकप्रियता को सिद्ध करता है। संगीत, अभिनय हो, भोजन के प्रतिस्पर्द्धा शोज़, बिग बॉस हो या अन्य कोई रियलिटी शो, सभी में बहु भाषी प्रांतीय प्रतिभागियों की भागीदारी से बोल चाल की भाषा, में हिंदी को प्रमुखता के रूप में अपनाया जा रहा है। यही नहीं अंग्रेजी के सीमित अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के बीच हिंदी के दैनिक साप्ताहिक और मासिक अख़बारों और पत्र पत्रिकाओं की संख्या सर्वाधिक हिंदी भाषा की है। देश की संसद हो या जनप्रतिनिधियों के चुनाव में कोई भी मंच वहाँ भी हिंदी ही प्रमुख स्थान पाती है। बरसों से हमारी आकाशवाणी और प्रसार भारती, दूरदर्शन की सेवाएँ हिंदी को ही बल देती रहीं है। क्योंकि यही राष्ट्रीय एकीकरण की शक्तिशाली प्रधान माध्यम है। आज विदेशी नागरिक भी हिन्दी भाषा को अपना रहे है। यह हमारे देश के लिए सुखद अनुभव है। यह सच है कि भाषा संस्कृति का आधार होती है हमारी संस्कृति भारतीय है, हिंदुस्तानी है, इसलिए हिंदी को पृथक करके हम कैसे देख सकते हैं? जबकि वह हमारी रग-रग में समाई है इस ग्राम प्रधान देश में हिंदी के अस्तित्व को न तो ख़तरा था, न ही हो सकता है क्योंकि आज करोड़ों का हृदय पर हिंदी का राज है और यही सब के संपर्क की एकमात्र प्रमुख व मुखर भाषा है। जो सहज, सरल ग्रहणीय व स्वीकार्य है वैसे हम यह भी कह सकते हैं कि....
कोई बोलता है बोले कोई भी जुंबां मुंह से,
दिलों की बात करिए जुंबान में क्या रक्खा है?
हिन्दी हमारा गौरव है, माँ भारती के ललाट का चंदन। तो किसी भी प्रकार का भ्रम में न पड़ते हुए हमें हिंदी दिवस को उत्सव रूप में मनाने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि...
हिंदी है जनगण की भाषा, हिंदी है हर मन की भाषा।
हिंदी है सिरमौर सभी की, यह तो है जन-जन की भाषा। शकुंतला सरूपरिया
सुर की कुटी में जा के आसन जमाईये।
केशव के कुंज में किलोल-केलि कीजिए,
तुलसी के मानस में डुबकी लगाइये।
भिन्न भाषा भाषियों! मिलेगा मनमाना सुख,
हिंदी के हिंडोले में जो कभी बैठ जाईये।
कोई भी भाषा हो वह हमारी अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम हुआ करती है इस देश में वर्षों से 14 सितंबर को राज भाषा-यानी हमारी मातृ भाषा हिंदी दिवस के रूप में उत्सवपूर्ण तरीक़े से मनाया जाता है। यही वह दिन है जब हम हिंदी भाषा के महत्व उसकी गरिमा उसके वर्चस्व को स्वीकारते हुए संप्रेषण के इस सुंदर माध्यम की अखंड भारत में वंदना करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार इस बात को दोहराया जा रहा है कि हमारी मातृभाषा हिंदी का अस्तित्व दूसी कुछ भाषाओं के कारण ख़तरे में है यह भी बात मुख्य रूप से कही जा रही है इस देश में एक दिन हिंदी के नाम पर एवं शेष दिवस सब हिंदी की अवहेलना में लगे रहते हैं। जबकि सच्चाई यह नहीं है भारत को एक सूत्र में पिरोये रखने में 17 उपभाषाओं को मिला कर बनी हिंदी भाषा की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है।
‘‘हिंदी है नाम इसका यह भाषा हिंदुस्तानी है,
दुष्यंत की ग़ज़ल है यह मुंशी की कहानी है।
दादू, क़बीर, मीरां सा परिवार है हिंदी का,
रसख़ान, सूर, रहीम सा संसार है हिन्दी का,
माँ भारती की लाड़ली संतो की बानी है।
हिंदी है नाम इसका, भाषा यह हिंदुस्तानी है।’’
सच्चाई तो यही है कि विद्यालयों में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के बावजूद आम भारतीय परिवारों में बातचीत का माध्यम अक्सर बच्चों से लेकर बड़ों तक हिंदी ही है क्योंकि अंग्रेजी और कान्वेंट विद्यालयों के नई पीढ़ी के बच्चे भले ही अंग्रेजी भाषा में अपने सभी विषय पढ़ते हों, मगर घरों में आज भी उन्हें हिंदी में इसलिये बातचीत करनी पड़ती है क्योंकि उनके माता-पिता उनकी तरह अंग्रेजी भाषा में उस तरह पारंगत नहीं है और यही बात आज के इस वातावरण में हिंदी को प्रभावशाली भाषा साबित करती है ।
‘‘शब्दों की सरलता हिन्दी की पहचान बन गई।
अंग्रेजी की साजिश से वह अनजान बन गई।।
इसे सौभाग्य कहें कि देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों में दिखाए जा रहे सभी हिंदी धारावाहिकों में प्रयुक्त हिंदी भाषा देश के दक्षिण प्रांतों में भी हिंदी को सरलता -सहजता से घर-घर तक पहुँचाया है। हिन्दी में हमारे देश में आये दिन देश के कोने-कोने में कवि सम्मेलनों का आयोजन भी इस की लोकप्रियता को सिद्ध करता है। संगीत, अभिनय हो, भोजन के प्रतिस्पर्द्धा शोज़, बिग बॉस हो या अन्य कोई रियलिटी शो, सभी में बहु भाषी प्रांतीय प्रतिभागियों की भागीदारी से बोल चाल की भाषा, में हिंदी को प्रमुखता के रूप में अपनाया जा रहा है। यही नहीं अंग्रेजी के सीमित अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के बीच हिंदी के दैनिक साप्ताहिक और मासिक अख़बारों और पत्र पत्रिकाओं की संख्या सर्वाधिक हिंदी भाषा की है। देश की संसद हो या जनप्रतिनिधियों के चुनाव में कोई भी मंच वहाँ भी हिंदी ही प्रमुख स्थान पाती है। बरसों से हमारी आकाशवाणी और प्रसार भारती, दूरदर्शन की सेवाएँ हिंदी को ही बल देती रहीं है। क्योंकि यही राष्ट्रीय एकीकरण की शक्तिशाली प्रधान माध्यम है। आज विदेशी नागरिक भी हिन्दी भाषा को अपना रहे है। यह हमारे देश के लिए सुखद अनुभव है। यह सच है कि भाषा संस्कृति का आधार होती है हमारी संस्कृति भारतीय है, हिंदुस्तानी है, इसलिए हिंदी को पृथक करके हम कैसे देख सकते हैं? जबकि वह हमारी रग-रग में समाई है इस ग्राम प्रधान देश में हिंदी के अस्तित्व को न तो ख़तरा था, न ही हो सकता है क्योंकि आज करोड़ों का हृदय पर हिंदी का राज है और यही सब के संपर्क की एकमात्र प्रमुख व मुखर भाषा है। जो सहज, सरल ग्रहणीय व स्वीकार्य है वैसे हम यह भी कह सकते हैं कि....
कोई बोलता है बोले कोई भी जुंबां मुंह से,
दिलों की बात करिए जुंबान में क्या रक्खा है?
हिन्दी हमारा गौरव है, माँ भारती के ललाट का चंदन। तो किसी भी प्रकार का भ्रम में न पड़ते हुए हमें हिंदी दिवस को उत्सव रूप में मनाने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि...
हिंदी है जनगण की भाषा, हिंदी है हर मन की भाषा।
हिंदी है सिरमौर सभी की, यह तो है जन-जन की भाषा। शकुंतला सरूपरिया
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