इन दुलारियों को भी बेटों का सा प्यार दो
सूरज अभी डूबा नहीं है
आशा संजीवनी है
समय आ गया है
जब इन दुलारियों को भी बेटों का सा प्यार दो
अब बेटियों के जन्म पर भी थाली बजे
घर घर में, हर घर में
लड्डू बँंटें, खुशियाँ छा जाए।
विदुषी अरुंधती, गार्गी लोपामुद्रा के इस देश की विडंबना है कि सरकार की लाखों कोशिशों और महिला संबंधी कानूनों के बावजूद, संकीर्ण मानसिकता, अंधविश्वास और हल्की सोच के कारण, लिंगानुपात गड़बड़ाया हुआ है और घरों में बेटे और बेटी में फर्क़ बरकरार है जिस कारण यहाँ महिलाएं दोयम दर्जे पर हैं और उनके प्रति अत्याचार के ख़तरे दिनों दिन बढ़ते ही चले जा रहे हैं। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार 2000 से 2500 कन्याएँ इस मुल्क में जनने से पहले ही मारी जा रही हैं बेटों को प्राथमिकता देने के कारण ग़ैरकानूनी तरीक़े से, छिपे तौर पर बेटियाँ माँ की कोख में कुछ ओेंस की बनते ही माँओं पर अनचाहा दबाव बनाकर निकाल दी जाती है और इसका दाग़ और आरोप भी उसी माँ पर लगाया जाता है कि वह माँ कोख में अपनी ही मूरत की रक्षा नहीं कर पाई। मिलेंगे। सदियों से औरत की, बेटी की अवहेलना, तिरस्कार, अपमान और अमानवीय व्यवहार के कारण वे कहीं भी सिर नहीं उठा पातीं, यूनिसेफ ने भी कहा है कि इस देश में 10 फीसदी महिलाएँ विश्व जनसंख्या में लुप्त हैं जिनका आज तक किसी को पता नहीं।1994 के अनुसार प्रसव पूर्व गर्भधारण के बाद लिंग चयन अपराध है! इसीलिए राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने फास्ट ट्रैक अदालत का गठन करने की सैद्धांतिक अनुमति दी है ताकि कन्या भ्रूण हत्या से संबंधित मसले पर एक ही जगह सुनवाई हो सके। सच में अगर आज बेटियों को कोख में वह जन्म के बाद महफ़ूज़ नहीं रखा गया, तो सुना है कि यहाँ आने वाले 20 सालों में दो करोड़ युवक कुँवारे मिलेंगे। कन्याओं के लिए सही मायने में भारत सुरक्षित नहीं है। इसका उदाहरण आज के अखबारों और मीडिया चैनलों की रोज़ाना की खबरें देती हैं। जहाँ हर दिन 80 नन्हीं मासूमाएँ, महिलाएँ बेटियाँं युवतियाँ, वृद्धाएँ तक दुष्कर्म की शिकार बनाई जा रही है। हाल ही में दुष्कर्म के मामले में पकड़े गए अपराधी को फांसी की सजा का प्रावधान भी कर दिया गया है। आज अधिकांश घरों की दीवारें, कमरे, सीढ़ियाँ व छतें व आंगन गवाही दे सकते हैं कि दुष्कर्म के 55 फ़ीसदी यानी कि सबसे अधिक मामलों में, क़रीबी लोग, रिश्तेदार और परिचित शामिल होते हैं। यहाँ तक कि कुछ घरों में निर्मम पिता, दादा, भाई और जीजा तक दुष्कर्म करने लग जाते हैं वहीं ससुराल में कई अमानवीय ससुर, जेठ, देवर भी दुष्कर्मों में लिप्त हो जाते हैं। किसको कहें कि आज बेटियाँ सबसे सुरक्षित जगह पर और सबसे सुरक्षित हाथों में ही सबसे असुरक्षित हैं। इन अपने घरों से ही वे असीमित पीड़ा के संसार में अकेली रह जाती हैं आजन्म वेदना के साथ ! वहीं धार्मिक स्थलों क़रीबी रिश्तेदारों के घर, कॉलेज, ट्यूशन सेंटर, अस्पताल, स्कूल, सार्वजनिक स्थल, कार्यालयों में कुछ दरिंदे बेटियों को, महिलाओं को दुष्कर्म का शिकार बना रहे हैं। इधर बेटियों के साथ सामूहिक दुष्कर्मां के मामलों ने सिद्ध कर दिया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते के मंत्र दोहराता देश हमारा उस गर्त में जा रहा है जहाँ हैवानियत और दरिन्दगी की सीमाएँ पार करने से गुरेज नहीं है। ऊपर से सबूतों और गवाही के अभाव में दुष्कर्म पीड़िताएँ न्याय को तरसती रह जाती हैं। तभी तो..... घर बाहर जब देखूं लड़की डरी-डरी सी लगती है, है धड़कन से फिर भी मरी-मरी सी लगती है | न जाने क्यों आज भी यहाँ हर औरत की एक कहानी है पीड़ा, ज़ुल्म, संघर्ष, चुनौती, शोषण, अत्याचारों व अन्याय से भरा जीवन जीती हुई एक महिला को, एक बेटी को समानता का दर्जा न देने के लिए लोग कई बहाने बनाते हैं कि शास्त्रों में पुत्र को ही मुखाग्नि का पिंडदान का हक़ है’’ या कि पुत्री तो पराया धन होती है और पुत्र ही वंश का धारक होता है’’। हमारा आर्थिक सामाजिक बंटवारा भी कुछ ऐसा है कि इसमें महिलाएँ घर में रहे गृहस्थी संभाले और पुरुष बाहर जा करके कमा कर के लाएँ। आज भी अनेक घरों में बहू के काम की नौकरी की मनाही है। इस देश में दहेज प्रथा भी सदियों से कुंडली जमाये कब से बैठी है, भले ही कितनी महंगाई हो, ग़रीबी हो मगर परिवार में बेटी का रिश्ता तय होते ही बेटी वालों को विवाह होने की तारीख़ तक वर पक्ष को उपहार, सौगातों में तीज त्योहारों पर बेहद ख़र्च करना होता है। क्योंकि वे बेटों वाले से हीन माने जाते हैं। अपनी बेटी का विवाह होने तक माता-पिता का कलेजा मुट्ठी में रहता है और उस पर भी यह शक़ कि शाद नाशाद होगा शादीका सफर कौन जाने? आज तक हमारी सांस्कृतिक मान्यताएँ भी एक बेटे की माँ को बहू पर रौब चलाने और आँखें दिखाने का हक देती है और ससुराल की देहरी पर क़दम रखते समय एक बहू के मन में अपनी सास, ननद जेठानी के प्रति एक अनजाना सा पूर्वाग्रह और भय का अंश जरूर होता है जबकि वह भी उसकी तरह मादा है स्त्री होती हैं। अब समय आ गया है संपूर्ण समाज सामूहिक रुप से अपनी बच्चियों पर, बेटियों पर, महिलाओं पर हर वक़्त सुरक्षा की एक चौकस व चौकन्नी नज़र में रखें। उन्हें प्यार दुलार दें, इज़्ज़त दें, समानता का दर्जा दें वरना लग रहा है कि वह दिन दूर नहीं जब ईश्वर भी महिलाओं के साथ हो रहे लगातार ऐसे निर्मम व्यवहार, बर्बर और क्रूर अत्याचारों को देख, अति विचलित और दुखी हो कर इस दुनिया में बेटियों को भेजना बंद कर देंगे। तब केवल अपने पुरुषत्व के दंभ में जीते, अकेले पुरुषों से इस सृष्टि का नज़ारा कैसा होगा, यह कल्पना ही भयावह है।
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