सरस्वती वंदना

रोशनी के गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में।
शारदे तुझको बुलाऊँ,रागिनी के गाँव में।।
भावना को मांज दे तू, साधना को साध दे तू,
दिव्य लक्ष्यों की सवारी, शीश पे माँ हाथ दे तू।
आशीषों से मैं नहा गाऊँ, चाँदनी के गाँव में।
शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।।
मन को चन्दन की महक दे, भीगी भीगी नम पलक दे,
कंठ में भर माँ सरसता, होंठों कोयल सी कुहुक दे।
हर ऋतु के गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में।
शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।।
गीतों का मधुमास माँगू, रागों का आवास माँगू,
जागरण स्वर की वो लहरी, माँ तेरा विश्वास माँगू,
तू लिखा वो गीत गाऊँ, चाँदनी के गाँव में।
शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।।
वेदनाएँ जग की हर लूँ, सब के अश्रु नैन भर लूँ, 
विमल दृष्टि,नवल पथ दे, तेरे चरण मे शीश धर लूँ,
इतना बस वरदान पाऊँ, चाँदनी के गाँव में।
शारदे तुझको बुलाऊँ, रागिनी के गाँव में।।


बहाने थे बहाने ही रहे
 ग़ज़ल
धड़कनों के हम बहाने थे बहाने ही रहे,
ग़म हमारे यूँ दिवाने थे दिवाने ही रहे।
चेहरे पर चेहरा सजाये थक चुके हैं अब तो हम,
ख़्वाब कितने जो सजाने थे सजाने ही रहे।
ऐ, क़लमकारों क़लम से तुमको क्या हासिल हुआ?
 मुफ़लिसी के हम ठिकाने थे ठिकाने ही रहे।
दौर है ऐसा कि लफ़्जों के सहारे जी रहे,
वरना सिक्कों के ज़माने थे ज़माने ही रहे।
कुछ नहीं बदला हज़ारों इन्क़लाब आये मगर,
नये शहर में हम पुराने थे पुराने ही रहे।
ऐ, परिन्दो हिज़्रतें करने से तुमको क्या मिला?
चौंच में थे चार दाने चार दाने ही रहे।
ऐ ख़ुदा तू वक़्त की मुश्किल से दे दे अब निजात,
तुझको शिक़वे जो सुनाने थे सुनाने ही रहे।



आ जाना सनम

 ग़ज़ल
तेरी यादों का सुलगता वो शहर बाक़ी है,
अब तो आ जाना सनम, आधा पहर बाक़ी है।
मेरे लब पे तो दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं,
अब तलक तेरी जुंबाँ पे तो ज़हर बाक़ी है।
सुनने वाला न कोई, किस से करें शिक़वे-गिले?
मेरी आहों का भी पूरा ही असर बाक़ी है।
उम्र का फैला समन्दर मेरा, ख़ाली-ख़ाली,
किसी हिस्से में मोहब्बत की लहर बाक़ी है।
ज़ुल्म ढाने की अदा तेरी तो, तड़पाना शग़ल, 
लम्हा-लम्हा ये लगे तेरा क़हर बाक़ी है।
आज़माले मेरी साँसों का ये आखि़री सफ़र,
दिल दुखाने का हुनर थोड़ा अगर बाक़ी है।
कुछ बढ़ें मेरे क़दम कुछ तेरे भी सनम,
कह दे जो कहना हो,अब तक जो क़सर बाक़ी है।

 रब की सौग़ात      

                                                                        ग़ज़ल
मैं जानती तुम रोशनी, तुम रोशनी के साथ हो,
साँसों की बरक़त तुम से है तुम ज़िन्दगी के साथ हो।
तुम माँ, बहन, बीवी सी बन परछाइयों सी साथ हो,
मज़हब तुम्हारा ख़िदमतें दिन हो क या फिर रात हो।
जब कोख में बनती कली लगे नूर रब का साथ हो,
आबाद गुलशन तुमसे ही, तुम गुल-शज़र हो,पात हो।
हर काम का रखती हुनर, सबके दुआ बन साथ हो,
ग़ैरों के लिये करती दफ़न, जो ख़्वाब हों जज़्बात हो।
अहसां तुम्हारा दुनिया पे, तुम रब की इक सौग़ात हो,
कहाँ वो तरक़्क़ी मंज़िंलें, जहाँ न तुम्हारा साथ हो,
तुम आरज़ू तुम जुस्तज़ू, ममता की तुम बरसात हो।
तुम इन्द्रधनुष रिश्तों का हो, इन्सानियत के साथ हो,
ज़मीं, चाँद सूरज, आसमां, तुम्हीं तारों की बारात हो।
अब बस जगाना, जाग के, तुम हौसलों के साथ हो,
तुम न किसी को बख़्शना, आघात या जब घात हो।
गाँव , बस्ती शहरों में, तुम-हम सभी इक जा़त हो।




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