’हे कृष्ण ! बचा लो नन्ही-नन्ही बच्चियों को !!’

’हे कृष्ण ! बचा लो नन्ही-नन्ही बच्चियों को!!’       

 हे कृष्ण! आज गिनती कर रही हूँ इस बर्बर होते, क्रूर समाज में उन दुष्कर्मी पापियों के हाथों मसल दी गई, नन्हीं-नन्हीं बच्चियों की, जिनके दूध के दाँत तक नहीं गिरे हैं, अभी जिनकी आवाज़ की तुतलाहट बरक़रार है, जिनकी मासूम आँखों ने अभी तक अपने भविष्य के लिए एक भी सुंदर सपना तक नहीं देखा। जिनके नन्हें पाँवों ने अभी देहरी के बाहर आसपास के तमाम रास्तों को जाना और पहचाना तक नहीं है। मगर दुर्भाग्य से एक दिन के लिए ही सही,वो जो अखबारों की सुर्खियां बन चुकी हैं व जिन हतभागिनियों का ताज़ा नाम शामिल हो चुका है दुष्कर्म पीड़िताओं में। वह पीड़िता जिसने अभी सुख को जाना था, ना किसी दुःख को, यक़ायक़ लहूलुहान कर दी गई है तन -मन, आत्मा से घायल कर दी गई हैं और तभी तो सर पटक पटक के रो रही हैं ’’उनकी जन्म दायिनी माँ, भीतर ही भीतर मर चुके है,ं हताश-उदास बाबुल। स्तब्ध हैं परिजन आसपास के लोग रिश्तेदार। पूरे एक दिन चर्चा में रहती है वह अखबारी सुर्ख़ियों में आई एक ‘‘दुष्कर्म पीड़िता’’ के नाम से। याद है मुझे इंदौर की वह 4 माह की दूध पीती बच्ची ,जिसे मार डाला था वहशी दरिंदे ने, कुचलने के बाद। रोम-रोम कांप उठा था उस दिन मेरा! पलकों की कोर पर आंसू तक भी ठिठक के सवाल पूछने लगे और होठों से यक़ायक़ निकला।’‘ हे ईश्वर! उन्हें  कभी माफ़ मत करना, उन्हें सज़ा देना, वे जानते हैं वह क्या कर रहे थे ?’’
आज आँखों के सामने घर के भीतर रखे उस रंगीन टीवी स्क्रीनों तक पर बेहूदा, विज्ञापन, बहसनुमा ख़बरों के साथ धारावाहिकों व फिल्मों में अधिकांश नारियों को द्रौपदी बनाकर पेश किया जा रहा है। खिड़की के बाहर झांका तो सुना कि हवाएँ और तमाम दिशाएँ मिलकर इस बर्बर होती सदी और कलयुग के दर्दीले गीत गा रही थी । हाँ ! केवल ऊपर आसमां को देखा तो, बस वही कौंधती बिजलियों के साथ उन नन्ही बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्मों के दर्द में बरस-बरस के ,सुबक सुबक क जार-जार रोता हुआ दिखा ! गांधारी सी  हो चुकी धरा के होठों पर तो सिर्फ़ एक खौफ़नाक चुप्पी थी । हे कृष्ण! यहाँ एकांत में मन के भीतर है एक हाहाकार, एक फ़रियाद, एक रोष ,एक चीख। जो “मन“ शायद उन में से किसी एक दुष्कर्म पीड़िता बच्ची के मर जाने पर उसे श्रद्धांजलि देने के लिए हाथों में मोमबत्ती लिए खड़ी भीड़ की क़तार में जाने तक का समय निकालने तक की बेबस संवेदना मात्र रखता है । मगर सिर्फ़, केवल अपने नगर की सीमा क्षेत्र में। हे कृष्ण! बाक़ी उन बच्चियों का क्या? जो किसी कस्बे में, किसी छोटे गांव में किसी गरीब के घर में किसी पापी की बर्बरता का शिकार होकर निर्दोष मारी गईं, केवल मादा के रूप में पैदा होने के जुर्म में ? कृपा करउनके लिए तुम ज़रूर ले जाना, मोमबत्ती नहीं कुछ जलते हुए दीपक। टपकाना दो आंसू तुम भी। परंतु हे कृष्ण ! तुम लेते आना न्याय की संवेदनाओ से लबरेज़ हज़ारों तुलाएँ भी और सौंप देना न्यायाधीशों को। समझा देना उन्हें, अर्जुन की भांति । पढ़ा देना कलयुग की नई गीता का पाठ। ले आना हजारों सुदर्शन चक्र सौंप देना  पुलिस प्रशासन को। ताकि उन दुष्कर्मी कुकर्मियों को कड़ा दण्ड दिलाने में देरी न करें।
हे कृष्ण ! बार-बार तुमसे करबद्ध याचना करती हूँ कि तमाम पुरुषों के ह््रदय में भर देना स्त्री जैसी कुछ ममता, कुछ दया,  कुछ करूणा और कुछ संवेदनाएँ भी । ताकि आधी आबादी के खिलाफ़ कुछ करने से पहले उनका ह््रदय कांप जाए और वे नहीं डालें किसी भी स्त्री पर बुरी नज़र और उसकी इज़्ज़त  पर हाथ !  नहीं मसलें, मासूम नन्ही बच्चियों को, उनके सपनों को ,उनके भविष्य को। कभी भी,,कहीं भी।                                 

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